भारतीय सिनेमा में कुछ फिल्में सिर्फ फिल्में नहीं होतीं, वे एक उत्सव बन जाती हैं। जब बात नंदमुरी बालकृष्ण (NBK) और डायरेक्टर बोयापति श्रीनु की जोड़ी की हो, तो स्क्रीन पर आग लगना तय है। साल 2021 में आई ‘अखंडा’ ने जिस तरह से बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला दी थी, उसके बाद से ही इसके सीक्वल का इंतजार हो रहा था।
आज 12 दिसंबर 2025 को आखिरकार वह इंतजार खत्म हो गया है। ‘अखंडा 2: तांडवम’ (Akhanda 2: Thandavam) सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है और जैसा कि उम्मीद थी, यह फिल्म सिर्फ शोर नहीं, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर गदर मचाने आई है।
फिल्म का पहला शो खत्म होते ही सोशल मीडिया से लेकर सिनेमा हॉल के बाहर तक सिर्फ “जय बालया” के नारे गूंज रहे हैं। यह फिल्म मास मसाला, डिवोशन (भक्ति) और एक्शन का ऐसा मिश्रण है जिसे केवल बोयापति श्रीनु ही पर्दे पर उतार सकते हैं।
अगर आप लॉजिक, फिजिक्स और ग्रेविटी को घर रखकर सिनेमा हॉल जाते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए किसी विजुअल ट्रीट से कम नहीं है। Akhanda 2 Review में आज हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि क्या यह फिल्म अपने पहले भाग से बेहतर है और क्या बालकृष्ण का जादू एक बार फिर दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा है।
फिल्म की कहानी वहीं से आगे बढ़ती है जहां पहला भाग खत्म हुआ था, लेकिन इस बार कैनवास और भी बड़ा है। अगर पहले भाग में लड़ाई एक क्षेत्र तक सीमित थी, तो ‘अखंडा 2’ में यह लड़ाई प्रकृति और धर्म की रक्षा तक पहुंच गई है। कहानी एक बड़े सामाजिक मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां एक शक्तिशाली कॉर्पोरेट माफिया और भ्रष्ट राजनेता मिलकर प्रकृति के नियमों के खिलाफ जा रहे हैं। वे एक पवित्र वन क्षेत्र और वहां के प्राचीन मंदिर को नष्ट करना चाहते हैं।
जब सिस्टम और कानून फेल हो जाते हैं, और अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है, तब एंट्री होती है अखंडा की। बालकृष्ण इस बार भी डबल रोल में हैं। एक तरफ एक आम आदमी जो अन्याय के खिलाफ लड़ रहा है लेकिन कमजोर पड़ता है, और दूसरी तरफ वह अघोरी ‘अखंडा’ जो शिव का रौद्र रूप है।
फिल्म का पूरा फोकस इस बात पर है कि कैसे अखंडा आता है और अपने त्रिशूल से पापियों का संहार करता है। कहानी में कोई बहुत बड़ा ट्विस्ट नहीं है, लेकिन जिस तरह से इसे प्रस्तुत किया गया है, वह आपको सीट से बांधे रखता है।
बोयापति श्रीनु की फिल्मों की कहानी अक्सर सिंपल होती है, लेकिन उनका स्क्रीनप्ले उसे खास बनाता है। इस बार भी उन्होंने वही किया है। फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा धीमा लग सकता है क्योंकि इसमें कहानी को सेटअप किया गया है और विलेन की क्रूरता को दिखाया गया है। लेकिन इंटरवल ब्लॉक पर जब अघोरी की एंट्री होती है, तो हॉल में सीटियों का शोर इतना तेज होता है कि डायलॉग्स सुनाई भी नहीं देते।
अभिनय: 65 की उम्र में बालया की दहाड़
नंदमुरी बालकृष्ण उम्र को महज एक नंबर साबित करते हैं। 65 साल की उम्र में भी उनकी एनर्जी आज के युवा स्टार्स को शर्मिंदा कर सकती है। फिल्म में उनका डबल रोल है, लेकिन असली शो-स्टॉपर उनका अघोरी अवतार ही है। जब वे स्क्रीन पर संस्कृत के श्लोक बोलते हैं और अपनी आँखों से गुस्सा जाहिर करते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनकी डायलॉग डिलीवरी इतनी पावरफुल है कि लगता है साक्षात शेर दहाड़ रहा हो।
सिविलियन रोल में भी उन्होंने अच्छा काम किया है, इमोशनल सीन्स में वे जंचते हैं। लेकिन जैसे ही वे भगवा वस्त्र और रुद्राक्ष पहनकर, हाथ में त्रिशूल लिए स्क्रीन पर आते हैं, दर्शक दीवाने हो जाते हैं। उनके चलने का स्टाइल, उनका स्वैग और एक्शन सीन्स में उनकी फुर्ती काबिले तारीफ है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बालकृष्ण के बिना अखंडा फ्रेंचाइजी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वे इस फिल्म की आत्मा हैं।
विलेन के तौर पर इस बार मेकर्स ने एक बहुत ही दमदार चेहरे को कास्ट किया है। विलेन का किरदार जितना क्रूर और ताकतवर होता है, हीरो की जीत उतनी ही शानदार लगती है। विलेन ने बालकृष्ण को कड़ी टक्कर दी है। बाकी सह-कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाएं ठीक-ठाक निभाई हैं, लेकिन सच कहें तो यह पूरी तरह से ‘वन मैन शो’ है। फीमेल लीड का काम सीमित है, लेकिन कहानी को आगे बढ़ाने में उनका योगदान महत्वपूर्ण है।
निर्देशन और स्क्रीनप्ले: बोयापति का मास फॉर्मूला
बोयापति श्रीनु को ‘मास पल्स’ का डॉक्टर कहा जाता है और उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उन्हें दर्शकों की नब्ज पता है। उन्हें पता है कि बालकृष्ण के फैंस क्या देखना चाहते हैं। फिल्म में स्लो-मोशन शॉट्स की भरमार है। हवा में उड़ती गाड़ियां, टूटती हड्डियां और खून की होली—यह सब बोयापति का सिग्नेचर स्टाइल है।
निर्देशन के मामले में उन्होंने पार्ट 1 के स्तर को बनाए रखा है। हालांकि, कुछ जगहों पर लगता है कि वे एक्शन के चक्कर में कहानी को थोड़ा खींच रहे हैं। सेकंड हाफ पूरी तरह से एक्शन पैक्ड है। क्लाइमेक्स फाइट सीक्वेंस को बहुत ही भव्य तरीके से शूट किया गया है। विजुअल्स ग्रांड हैं और सेट्स पर काफी पैसा खर्च किया गया है। मंदिर और गुफाओं के सीन्स बहुत ही ऑथेंटिक लगते हैं।
लेकिन अगर आप एक कसी हुई पटकथा और बहुत बुद्धिमान सिनेमा की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म शायद आपको निराश करे। बोयापति का सिनेमा लाउड होता है। यहां इमोशन्स भी लाउड हैं और एक्शन भी। फिल्म में लॉजिक ढूंढने की कोशिश न करें। यह एक ‘लार्जर दैन लाइफ’ अनुभव है जिसे केवल महसूस किया जा सकता है।
संगीत और बैकग्राउंड स्कोर: थमन का जादू
अगर बालकृष्ण इस फिल्म का शरीर हैं, तो एस. थमन (S. Thaman) का संगीत इसकी धड़कन है। ‘अखंडा 1’ की सफलता में थमन के बैकग्राउंड स्कोर (BGM) का बहुत बड़ा हाथ था और सीक्वल में भी उन्होंने निराश नहीं किया है। फिल्म का बीजीएम इतना लाउड और पावरफुल है कि कई बार आपको लगेगा कि थियेटर के स्पीकर फट जाएंगे।
खासकर अघोरी वाले सीन्स में जब ‘अखंडा… अखंडा…’ का मंत्र बजता है, तो एक अलग ही माहौल बन जाता है। डिवोशनल गानों और मंत्रों का प्रयोग बहुत ही खूबसूरती से किया गया है जो फिल्म को एक आध्यात्मिक स्तर पर ले जाता है। एक्शन सीन्स में ड्रम्स और शंखनाद का प्रयोग एड्रेनालाईन रश देता है। गाने भी अच्छे हैं और विजुअली अपीलिंग हैं, लेकिन असली विनर बीजीएम ही है।
तकनीकी पक्ष: विजुअल्स और वीएफएक्स
तकनीकी रूप से फिल्म काफी समृद्ध है। सिनेमेटोग्राफी शानदार है। रात के सीन्स और एक्शन सीक्वेंस को बहुत अच्छे से कैप्चर किया गया है। रंगों का प्रयोग, खासकर अघोरी वाले हिस्सों में भगवा और काले रंग का कंट्रास्ट, देखने लायक है। एडिटिंग थोड़ी और क्रिस्प हो सकती थी, खासकर फर्स्ट हाफ में। फिल्म की लंबाई थोड़ी ज्यादा महसूस होती है।
वीएफएक्स (VFX) का काम ठीक-ठाक है। कुछ जगहों पर सीजीआई (CGI) थोड़ा कमजोर लगता है, खासकर जानवरों वाले सीन्स में, लेकिन मास ऑडियंस शायद इस पर ज्यादा ध्यान न दे। कुल मिलाकर प्रोडक्शन वैल्यू बहुत हाई है और फिल्म बड़े पर्दे के लिए ही बनी है।
क्या फिल्म में कुछ कमियां हैं?
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। Akhanda 2 Review में कमियों की बात करना भी जरूरी है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी घिसी-पिटी कहानी है। वही पुराना बदला, वही करप्शन और वही मसीहा। नयापन केवल ट्रीटमेंट में है, कहानी में नहीं। हिंसा का स्तर बहुत ज्यादा है, जो शायद कुछ पारिवारिक दर्शकों को असहज कर सकता है।
इसके अलावा, फिल्म बहुत ज्यादा लाउड है। लगातार शोर-शराबा और चीखना-चिल्लाना आपको थका सकता है। अगर आप मास मसाला फिल्मों के फैन नहीं हैं, तो यह फिल्म झेलना आपके लिए मुश्किल हो सकता है। फिल्म में महिलाओं के किरदार को और सशक्त बनाया जा सकता था, जो अक्सर तेलुगु कमर्शियल सिनेमा में नदारद रहता है।
बॉक्स ऑफिस भविष्यवाणी
जिस तरह की ओपनिंग ‘अखंडा 2’ को मिली है, उसे देखते हुए लगता है कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। तेलुगु राज्यों में तो यह फिल्म ब्लॉकबस्टर होना तय है, लेकिन हिंदी बेल्ट में भी इसे अच्छा रिस्पॉन्स मिल सकता है क्योंकि ‘अखंडा 1’ को टीवी और यूट्यूब पर हिंदी दर्शकों ने खूब पसंद किया था।
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छुट्टियों का सीजन और बालकृष्ण का स्टारडम मिलकर इसे 100 करोड़ के क्लब में बहुत तेजी से पहुंचा सकते हैं। मास सेंटर्स में यह फिल्म हफ्तों तक चलने का दम रखती है। यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है जो सिनेमाहॉल में सीटी बजाने और नाचने जाते हैं।
निष्कर्ष: क्या देखें या नहीं?
कुल मिलाकर, ‘अखंडा 2: तांडवम’ बालकृष्ण के फैंस के लिए किसी त्योहार से कम नहीं है। यह एक शुद्ध ‘मास मसाला डिवोशनल एंटरटेनर’ है। अगर आपको ‘अखंडा’ पसंद आई थी, तो यह फिल्म आपको दोगुना मजा देगी। बालकृष्ण का रौद्र रूप, थमन का संगीत और बोयापति का एक्शन—यह एक ऐसा कॉकटेल है जो आपको निराश नहीं करेगा।
लेकिन अगर आप संवेदनशील, यथार्थवादी या आर्ट सिनेमा के शौकीन हैं, तो आप इससे दूर ही रहें। यह फिल्म दिमाग से नहीं, दिल और भक्ति भाव से देखने वाली फिल्म है। मेरी सलाह है कि इसे सिंगल स्क्रीन थियेटर में देखें, जहां आप असली माहौल का मजा ले सकें।
रेटिंग: 3.5/5 स्टार (यह रेटिंग विशुद्ध रूप से मास एंटरटेनमेंट फैक्टर के आधार पर है)
Related Disclaimer : यह फिल्म समीक्षा लेखक के व्यक्तिगत विचारों और फिल्म के सिनेमाई तत्वों के विश्लेषण पर आधारित है। हमारा उद्देश्य पाठकों को फिल्म के बारे में निष्पक्ष जानकारी देना है। हम किसी भी तरह की हिंसा या अंधविश्वास का समर्थन नहीं करते हैं। ताज़ा बॉक्स ऑफिस अपडेट्स के लिए हमारे साथ बने रहें।