बिहार में ‘सुशासन’ और ‘कानून के राज’ का डंका पीटने वाली सरकार के दावों की एक बार फिर से दरभंगा में सरेआम धज्जियां उड़ गई हैं। एक तरफ सत्ता के वातानुकूलित कमरों में बैठकर अपराध नियंत्रण की बड़ी-बड़ी बातें और दावे किए जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, अपराधी बेखौफ होकर खुलेआम खून की होली खेल रहे हैं।
ताजा और सनसनीखेज मामला दरभंगा के विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र का है। यहां अलीनगर मोहल्ले में सरेआम दिनदहाड़े एक युवक को गोली मार दी गई।
इस खौफनाक गोलीकांड ने शहर की लचर कानून-व्यवस्था (Law and Order) की पूरी पोल खोल कर रख दी है। आम जनता अब दहशत के साए में जीने को मजबूर है।
प्राप्त जानकारी और पुलिस के शुरुआती बयानों के अनुसार, यह पूरी खौफनाक घटना दरभंगा के भीड़भाड़ वाले अलीनगर मोहल्ले में घटी है।
यहां दो गुटों के बीच किसी पुराने विवाद को लेकर एक ‘पंचायती’ (पंचायत) चल रही थी। विवाद को शांति से सुलझाने के लिए कुछ लोग इकट्ठा हुए थे।
लेकिन, बातों ही बातों में माहौल इतना गरमा गया कि नौबत गाली-गलौज और हथियार निकालने तक आ गई। शांतिपूर्ण बातचीत का यह दौर अचानक खूनी खेल में तब्दील हो गया।
बिना किसी पुलिसिया खौफ के, एक पक्ष के लोगों ने वहां सरेआम फायरिंग कर दी। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका दहल उठा और वहां भारी भगदड़ मच गई।
शिकार बना 26 साल का गौरव चौधरी
इस अंधाधुंध और अचानक हुई फायरिंग में एक 26 वर्षीय युवक बुरी तरह से जख्मी हो गया। पीड़ित युवक की पहचान गौरव चौधरी के रूप में हुई है। गौरव चौधरी मूल रूप से दरभंगा के सदर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले रानीपुर (Ranipur) गांव का रहने वाला है। उसके पिता का नाम अरविंद चौधरी बताया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि गोली गौरव के पेट के दाईं ओर बेहद करीब से लगी है। गोली लगने के बाद वह चीखता हुआ खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़ा।
डीएमसीएच (DMCH) में जिंदगी और मौत से जंग
घटना के तुरंत बाद, वहां मौजूद कुछ स्थानीय लोगों ने इंसानियत दिखाते हुए और आनन-फानन में घायल गौरव चौधरी को दरभंगा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (DMCH) पहुंचाया। फिलहाल डीएमसीएच के इमरजेंसी वार्ड में डॉक्टरों की एक विशेष टीम उसका सघन इलाज कर रही है।
डॉक्टरों के प्रारंभिक परीक्षण के अनुसार, गोली उसके पेट के अंदर ही गहराई में फंसी हुई है, जिससे कई अंदरूनी अंगों को नुकसान पहुंचने की आशंका है।
गोली को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए इमरजेंसी सर्जरी की जा रही है। अस्पताल परिसर में गौरव के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और पूरे परिवार में मातम पसरा है।
परिवार के सदस्यों का विलाप सुनकर वहां मौजूद हर शख्स का दिल पसीज रहा है। साथ ही इस नकारे प्रशासनिक सिस्टम के प्रति आम जनता का गुस्सा लगातार उफान मार रहा है।
कहां है ‘सुशासन’? पुलिस की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
इस दुस्साहसिक वारदात ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बिहार में अपराधियों के मन से पुलिस की वर्दी और कानून का खौफ पूरी तरह से खत्म हो चुका है।
गोलीबारी की सूचना मिलने के बाद विश्वविद्यालय थाने की पुलिस घटनास्थल (अलीनगर) पर पहुंची। लेकिन पुलिस के पहुंचने तक गोलियां चलाने वाले सभी आरोपी फरार हो चुके थे।
पुलिस अब मामले की तफ्तीश करने, चश्मदीदों से पूछताछ करने और आसपास के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज खंगालने की अपनी वही पुरानी और रटी-रटाई प्रक्रिया को दोहरा रही है।
अपराधियों के हौसले इतने बुलंद कैसे?
जब राज्य के मुख्यमंत्री ‘सुशासन’ और ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की कसमें खाते हैं, तो अपराधियों को सरेआम हथियार लहराने की हिम्मत कहां से मिलती है?
क्या दरभंगा में पुलिस का खुफिया तंत्र (Intelligence Network) पूरी तरह से सो चुका है? अपराधियों को यह यकीन कैसे है कि वे दिनदहाड़े गोली मारकर आसानी से बच निकलेंगे?
यह घटना पुलिस प्रशासन के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि ‘सुशासन’ सिर्फ महंगे विज्ञापनों और अखबारों के पन्नों तक ही सीमित रह गया है।
खौफ में है शहर: आम आदमी की सुरक्षा भगवान भरोसे
दरभंगा, जिसे मिथिलांचल की सांस्कृतिक राजधानी और कभी शांति का केंद्र माना जाता था, वह अब आए दिन ऐसी खूनी वारदातों से लाल हो रहा है।
शहर में लगातार बढ़ रहे अपराध के ग्राफ ने आम लोगों की रातों की नींद हराम कर दी है। नागरिक अब यह सोचने पर मजबूर हैं कि क्या अब विवादों का फैसला अवैध हथियारों से होगा?
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अगर राज्य के नागरिक दिनदहाड़े भी सुरक्षित नहीं हैं, तो फिर वे न्याय और सुरक्षा की गुहार लगाने किसके पास जाएंगे?
शहर का व्यापारी वर्ग, छात्र और आम नागरिक हर कोई इस बढ़ती गुंडागर्दी के कारण दहशत के साए में जीने को विवश है।
हमारा निष्कर्ष
अलीनगर की यह फायरिंग सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है। यह पूरे प्रशासनिक और पुलिस सिस्टम की भारी विफलता (System Failure) का जीता-जागता सबूत है।
अब वक्त आ गया है कि सरकार सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर अपना इकबाल (Authority) कायम करे। अपराधियों के मन में तुरंत सजा का खौफ बैठना चाहिए।
जब तक पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार कर सख्त से सख्त सजा नहीं दिलवाती, तब तक ‘सुशासन’ का यह नारा सिर्फ एक क्रूर मजाक ही लगेगा।
Disclaimer: इस न्यूज़ रिपोर्ट में दी गई सभी जानकारियां (नाम, स्थान और घटनाक्रम) विश्वविद्यालय थाने की पुलिस जांच और 24 फरवरी 2026 की नवीनतम मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। ‘खबर आंगन’ पुलिसिया कार्रवाई का सम्मान करता है और यह लेख स्थानीय कानून-व्यवस्था पर एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है। पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है।