वैश्विक जलवायु परिवर्तन की चुनौती तेजी से गहराती जा रही है, और इस बीच दुनियाभर में सरकारों की जलवायु कार्रवाई को लेकर कड़ी निगरानी की जा रही है। इसी क्रम में हाल ही में जारी Climate Change Performance Index (CCPI) 2026 में भारत को झटका लगा है। भारत की रैंकिंग इस साल 13 स्थान गिरकर 23वें स्थान पर आ गई है। यह गिरावट न सिर्फ भारत की जलवायु रणनीति पर सवाल खड़ा करती है, बल्कि यह भी बताती है कि वैश्विक मानकों की तुलना में भारत के कदम कितने पर्याप्त हैं।
यह रिपोर्ट हर साल जर्मनवॉच, न्यू क्लाइमेट इंस्टिट्यूट और क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा जारी की जाती है। इसमें दुनिया के 60 से अधिक देशों और यूरोपीय संघ की जलवायु प्रदर्शन क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है। भारत की रैंकिंग पिछले वर्षों में बेहतर मानी जाती थी, लेकिन इस बार आए भारी गिरावट ने अनेक चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
•भारत ने भले ही नवीकरणीय ऊर्जा में बड़ा निवेश किया है, लेकिन CCPI की रिपोर्ट के अनुसार इसकी प्रगति अभी भी “काफी नहीं” है।
•ग्रिड-स्तर की बड़े पैमाने पर नवीकरणीय परियोजनाओं में जमीन की उपलब्धता
•पर्यावरणीय प्रभाव
•स्थानीय समुदायों में विरोध
इन कारणों से कई परियोजनाएँ धीमी रफ्तार से आगे बढ़
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में अब भी जीवाश्म ईंधन, विशेषकर कोयला और पेट्रोलियम से जुड़े क्षेत्रों को प्रति वर्ष भारी सब्सिडी दी जाती है।
इससे ग्रीन ऊर्जा की गति अपेक्षा के अनुरूप तेज नहीं हो पाती।
भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है, लेकिन मध्यवर्ती लक्ष्यों,राज्य-स्तरीय समय-सीमा,पारदर्शी निगरानी तंत्र
इन सभी की कमी को रिपोर्ट में प्रमुख कमज़ोरियों के रूप में चिन्हित किया गया है।
1. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (GHG Emission)
भारत की रेटिंग — मध्यम (Medium)
भारत वैश्विक औसत से कम उत्सर्जन करने वाला देश है, लेकिन उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है।
2. नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy)
भारत की रेटिंग — निम्न (Low)
इस श्रेणी में भारत की गिरावट सबसे अधिक चिंता का कारण है।
3. ऊर्जा उपयोग (Energy Use)
भारत की रेटिंग — मध्यम (Medium)
ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के कदम सराहनीय हैं, लेकिन औद्योगिक और परिवहन सेक्टर में अधिक प्रयास की जरूरत है।
4. जलवायु नीति (Climate Policy)
भारत की रेटिंग — मध्यम (Medium)
मौजूदा नीतियों में दिशा तो दिखती है, लेकिन उनके कार्यान्वयन और सख्ती में कमी है।
रिपोर्ट में भारत की उपलब्धियों को भी सराहा गया
रैंकिंग गिरने के बावजूद CCPI ने भारत के कई कदमों की सराहना की है:
1. गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 50% के पार
भारत ने 2030 के लक्ष्य से पहले ही अपनी स्थापित बिजली क्षमता में 50% हिस्सा गैर-फॉसिल स्रोतों से हासिल कर लिया है।
यह एक बड़ी उपलब्धि है।
2. ग्रीन फाइनेंस और कार्बन मार्केट
भारत में ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी,कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम,ग्रीन हाइड्रोजन मिशन जैसी योजनाओं को रिपोर्ट में सकारात्मक बताया गया है।
3. इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार
EV नीति और फेम-II योजना के चलते इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।
लेकिन गंभीर चिंताओं की भी कमी नहीं
1. कोयले से बाहर निकलने का कोई रोडमैप नहीं
वैश्विक स्तर पर 2030–2040 के बीच कोयले को पूरी तरह बंद करने की योजना वाले देशों की संख्या बढ़ रही है।लेकिन भारत ने अभी तक ऐसी कोई समय-सीमा तय नहीं की है।
2. बड़े पैमाने पर विस्थापन और सामाजिक असर
नवीकरणीय परियोजनाएं अक्सर बड़े भू-भाग की मांग करती हैं।
इससे कई राज्यों में,किसानों का विस्थापन,चरागाहों का दबाव,पर्यावरणीय विवाद जैसे मुद्दे सामने आए हैं।
3. न्यायपूर्ण ऊर्जा संक्रमण की कमी
कोयले पर आश्रित लाखों परिवारों के लिए वैकल्पिक रोजगार,पुनर्वास,कौशल विकास जैसी नीतियाँ बेहद कमजोर पाई गई हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार:
भारत की रैंकिंग गिरना यह संकेत देती है कि
“ग्रीन ग्रोथ” की दिशा में भारत को और तेज कदम बढ़ाने होंगे।
नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को जमीन पर लागू करने की गति बढ़ानी होगी।
कोयले को चरणबद्ध तरीके से बंद करने की समयबद्ध राष्ट्रीय योजना तैयार करनी होगी।
राज्य सरकारों को अपने-अपने जलवायु एक्शन प्लान को और मजबूत बनाना होगा।
आगे की राह: क्या करना होगा भारत को?
विशेषज्ञों ने भारत सरकार के लिए 5 महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:
1. कोयले से बाहर निकलने की स्पष्ट समय-सीमा
2030, 2035 और 2040 के लिए चरणबद्ध लक्ष्य तय करने की जरूरत है।
2. नवीकरणीय ऊर्जा में स्थानीय समुदायों की भागीदारी
जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को पारदर्शी और न्यायसंगत बनाना जरूरी है।
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3. स्वच्छ ऊर्जा में निजी निवेश बढ़ाना
टैक्स प्रोत्साहनों और आसान स्वीकृति प्रक्रियाओं की जरूरत है।
4. परिवहन और औद्योगिक क्षेत्र में डीकार्बोनाइजेशन
हाइड्रोजन-आधारित तकनीकों और ZEV (Zero Emission Vehicle) को बढ़ावा देना होगा।
5. जलवायु वित्त (Climate Finance) को मजबूत करना
राज्यों को फंडिंग बढ़ाकर स्थानीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन में सहायता करनी होगी।
निष्कर्ष: भारत के लिए चेतावनी, लेकिन अवसर भी
भारत की जलवायु-रैंकिंग में 13 स्थान की गिरावट एक चेतावनी है कि विश्व स्तर पर जलवायु कार्रवाई की प्रतिस्पर्धा बढ़ चुकी है।भारत ने कई क्षेत्रों में सराहनीय प्रगति की है, लेकिन,कोयला पर निर्भरता,लक्ष्य निर्धारण में अस्पष्टता,नवीकरणीय ऊर्जा के धीमे विस्तार जैसे मुद्दे रैंकिंग में गिरावट के मुख्य कारण बने।
यदि भारत स्पष्ट रोडमैप बनाता है नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार में तेजी लाता है।न्यायपूर्ण ऊर्जा संक्रमण लागू करता है,तो अगले वर्षों में भारत की रैंकिंग न सिर्फ सुधर सकती है, बल्कि भारत जलवायु नेतृत्व की पंक्ति में भी खड़ा हो सकता है।