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G RAM G Bill: मनरेगा का दौर खत्म, अब 125 दिन रोजगार की पक्की गारंटी

क्या मनरेगा का अंत ग्रामीण भारत के लिए नई शुरुआत है? G RAM G Bill में ऐसा क्या है जिसने विपक्ष को नाराज कर दिया? 125 दिन की गारंटी और तकनीक के पहरे में अब कैसे मिलेगी मजदूरी? वो सच जो अब तक छिपा था, जानने के लिए पढ़ें...
Khabar Aangan Thursday, 18 December 2025, 03:02 PM
G RAM G Bill: मनरेगा का दौर खत्म, अब 125 दिन रोजगार की पक्की गारंटी
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भारत के ग्रामीण परिदृश्य में आज एक ऐसे युग का अंत हुआ है जिसने पिछले दो दशकों से गांवों की अर्थव्यवस्था को संभाला था। संसद ने आज भारी शोर-शराबे के बीच Viksit Bharat – G RAM G Bill 2025 को पारित कर दिया है। यह नया कानून अब उस ‘मनरेगा’ की जगह लेगा जिसे कभी ग्रामीण भारत की लाइफलाइन कहा जाता था।

केंद्र सरकार ने इस कदम को केवल नाम का बदलाव नहीं, बल्कि ग्रामीण सशक्तिकरण का नया विजन बताया है। सरकार का तर्क है कि पुराने कानून की सीमाएं अब विकास में बाधा बन रही थीं। नए कानून के जरिए अब गांवों में न केवल काम के दिन बढ़ेंगे, बल्कि तकनीक का ऐसा पहरा होगा कि भ्रष्टाचार की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी।

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लोकसभा में इस बिल पर चर्चा के दौरान पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। विपक्षी दलों ने इसे महात्मा गांधी की विरासत को मिटाने की कोशिश बताया, तो वहीं सत्ता पक्ष ने इसे ‘नए भारत का नया संकल्प’ करार दिया। इस कानून के लागू होते ही अब देश के करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार के नए द्वार खुलने की उम्मीद है।

100 दिन का संघर्ष अब 125 दिनों की पक्की खुशहाली में बदला

इस नए विधेयक की सबसे बड़ी और राहत भरी बात यह है कि अब रोजगार के दिनों की गारंटी को बढ़ा दिया गया है। अब तक मनरेगा के तहत अकुशल श्रमिकों को एक साल में केवल 100 दिन का ही कानूनी काम मिलता था। सरकार ने अब इस सीमा को बढ़ाकर 125 दिन कर दिया है, जो सीधे तौर पर मजदूरों की आय में 25 प्रतिशत का इजाफा करेगा।

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यह बदलाव उन परिवारों के लिए संजीवनी साबित होगा जो पूरी तरह से मजदूरी पर निर्भर हैं। अक्सर देखा गया था कि 100 दिन का काम खत्म होने के बाद मजदूर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते थे। अब अतिरिक्त 25 दिनों का भरोसा उन्हें अपने ही घर और गांव में रुकने का एक बड़ा कारण देगा।

इतना ही नहीं, इस बार बेरोजगारी भत्ते को लेकर भी कड़े नियम बनाए गए हैं। यदि किसी श्रमिक को आवेदन के 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो सरकार को उसे नकद मुआवजा देना होगा। यह जवाबदेही सीधे तौर पर जिला प्रशासन और पंचायत स्तर के अधिकारियों की होगी, जिससे काम की मांग और आपूर्ति में तेजी आएगी।

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एग्रीकल्चरल पॉज: खेती और मजदूरी के बीच का नया संतुलन

इस विधेयक में एक ऐसा प्रावधान है जिसकी मांग देश भर के किसान संगठन लंबे समय से कर रहे थे। ‘एग्रीकल्चरल पॉज’ के तहत अब राज्य सरकारें खेती के व्यस्त समय में ग्रामीण रोजगार कार्यों को रोक सकेंगी। अक्सर बुवाई और कटाई के दौरान खेतों में मजदूरों की भारी कमी हो जाती थी, जिससे खेती की लागत बढ़ती थी।

अब साल में अधिकतम 60 दिनों के लिए मनरेगा जैसे कामों पर विराम लगाया जा सकेगा। इसका सीधा फायदा यह होगा कि मजदूरों को खेतों में काम मिलेगा और किसानों को सही समय पर श्रमिक उपलब्ध होंगे। सरकार का मानना है कि इससे गांव की पूरी अर्थव्यवस्था में एक संतुलन बनेगा और कृषि उत्पादन में भी सुधार होगा।

हालांकि, यह ध्यान रखा जाएगा कि यह ‘पॉज’ केवल उन्हीं इलाकों में लगे जहां खेती की वास्तविक मांग है। राज्य सरकारों को इसके लिए बाकायदा नोटिफिकेशन जारी करना होगा ताकि मजदूरों को पहले से पता हो कि उन्हें उस दौरान कहां काम करना है। यह नीति खेती और मजदूरी को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बनाने की दिशा में एक बड़ा प्रयोग है।

तकनीक का सख्त पहरा: AI और ड्रोन से होगी हाजिरी की जांच

भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने के लिए इस बार G RAM G Bill में अत्याधुनिक तकनीक का समावेश किया गया है। अब कार्यों की निगरानी के लिए केवल इंसानी रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जाएगा। हर बड़े प्रोजेक्ट की जांच के लिए ड्रोन का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया है, जो सीधे मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट भेजेंगे।

श्रमिकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए अब ‘फेस रिकॉग्निशन’ यानी चेहरे की पहचान वाली बायोमेट्रिक प्रणाली लागू होगी। इससे उन फर्जी मस्टर रोल पर लगाम लगेगी जिनमें अक्सर कागजों पर ही मजदूरों को काम करते दिखा दिया जाता था। अब असली मजदूर को ही उसका असली हक मिलेगा और बीच के बिचौलियों का खेल पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

इस नई डिजिटल व्यवस्था के कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • रियल-टाइम ट्रैकिंग: हर प्रोजेक्ट की लोकेशन और प्रोग्रेस को आम लोग भी मोबाइल ऐप पर देख सकेंगे।
  • जियोस्पेशियल मैपिंग: काम शुरू होने से लेकर खत्म होने तक की तस्वीरें सैटेलाइट के जरिए रिकॉर्ड की जाएंगी।
  • डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर: मजदूरी का एक-एक पैसा सीधे मजदूर के आधार से जुड़े बैंक खाते में जाएगा।
  • AI ऑडिट: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए फंड के उपयोग और काम की गुणवत्ता का ऑटोमैटिक ऑडिट होगा।

फंडिंग का नया गणित: राज्यों के कंधों पर बढ़ी जिम्मेदारी

इस विधेयक ने केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय भागीदारी के पुराने समीकरणों को भी बदल दिया है। अब यह योजना पूरी तरह से ‘केंद्र प्रायोजित’ (Centrally Sponsored) होगी, जिसमें फंड का बंटवारा 60:40 के अनुपात में होगा। इसका मतलब है कि अब राज्य सरकारों को भी अपनी तिजोरी से 40 प्रतिशत पैसा खर्च करना पड़ेगा।

सरकार का तर्क है कि जब राज्य अपना पैसा लगाएंगे, तो वे योजना की निगरानी भी अधिक सख्ती से करेंगे। अब तक केंद्र से मिलने वाले फंड को लेकर अक्सर लापरवाही की शिकायतें आती थीं। हालांकि, पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 रखा गया है ताकि उन पर अधिक बोझ न पड़े।

इस नए फंडिंग पैटर्न को लेकर विपक्षी राज्यों ने कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के पास पहले से ही फंड की कमी है, ऐसे में 40 प्रतिशत का बोझ उठाना उनके लिए मुश्किल होगा। लेकिन केंद्र सरकार का कहना है कि यह राज्यों की जवाबदेही तय करने के लिए उठाया गया एक कड़ा पर जरूरी कदम है।

कमजोर वर्गों के लिए ‘स्पेशल गारंटी कार्ड’ और विशेष सुरक्षा

समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए इस कानून में बेहद संवेदनशील प्रावधान जोड़े गए हैं। एकल महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए अब ‘स्पेशल ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड’ जारी किए जाएंगे। इन लोगों को उनकी शारीरिक क्षमता के हिसाब से हल्का और उनके घर के पास ही काम दिया जाएगा।

विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के लिए बजट का एक बड़ा हिस्सा पहले ही सुरक्षित कर दिया गया है। सरकार का लक्ष्य है कि ‘विकसित भारत’ की इस यात्रा में कोई भी व्यक्ति पीछे न छूटे। यह कानून अब केवल गड्ढे खोदने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण विकास के स्थायी ढांचे जैसे स्कूल और अस्पताल बनाने में भी श्रमिकों का उपयोग करेगा।

ग्रामीण विकास की इन योजनाओं को अब ‘पीएम गति शक्ति’ मिशन के साथ जोड़ा जा रहा है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि गांव में बनने वाली हर सड़क या नाला भविष्य की बड़ी परियोजनाओं के साथ तालमेल बिठा सके। यह गांवों को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस करने की एक बड़ी और व्यापक योजना का हिस्सा है।

नाम पर मचे विवाद के बीच गांधी जी की विरासत पर बहस

संसद से लेकर सड़कों तक इस विधेयक के नाम को लेकर भारी विवाद देखा जा रहा है। ‘महात्मा गांधी’ का नाम हटाए जाने को विपक्ष ने बापू की विचारधारा पर हमला बताया है। कांग्रेस ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार इतिहास से गांधी जी के योगदान को मिटाना चाहती है, जो कभी सफल नहीं होगा।

दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष का कहना है कि यह कानून गांधी जी के ‘ग्राम स्वराज्य’ के सपने को ही हकीकत में बदल रहा है। उनका तर्क है कि नाम से ज्यादा काम मायने रखता है और G RAM G Bill पुराने मनरेगा से कहीं ज्यादा शक्तिशाली और पारदर्शी है। सरकार के मुताबिक, 125 दिन का रोजगार देना ही बापू के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

यह विवाद आने वाले चुनाव में भी एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। दोनों तरफ से अपनी-अपनी दलीलें दी जा रही हैं, लेकिन असली फैसला तो उन करोड़ों मजदूरों को करना है जिनकी जिंदगी इस कानून से सीधे प्रभावित होगी। राजनीति से परे, अगर यह कानून वास्तव में रोजगार और आय बढ़ाता है, तो नाम का विवाद गौण हो जाएगा।

बिहार और पलायन की समस्या पर होगा बड़ा असर

बिहार जैसे राज्यों के लिए यह नया कानून किसी वरदान से कम नहीं है। राज्य की एक बड़ी आबादी आज भी मजदूरी के लिए दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों की ओर पलायन करती है। अगर G RAM G Bill के तहत 125 दिनों का पक्का काम मिलता है, तो पलायन की रफ्तार में काफी कमी आ सकती है।

बिहार में बाढ़ और जल संचयन की समस्याओं को देखते हुए, इस नए कानून के फंड का बड़ा हिस्सा जल निकायों के जीर्णोद्धार में लगाया जाएगा। इससे न केवल रोजगार मिलेगा, बल्कि कृषि उत्पादन में भी सुधार होगा। राज्य सरकार ने भी केंद्र के इस कदम का स्वागत किया है और इसे लागू करने के लिए अपनी तैयारी शुरू कर दी है।

ग्रामीण बाजारों में जब पैसा पहुंचेगा, तो स्थानीय व्यापार को भी गति मिलेगी। एक मजदूर जब 125 दिन की कमाई घर ले जाएगा, तो उसकी क्रय शक्ति बढ़ेगी, जिसका लाभ छोटे दुकानदारों और कारोबारियों को मिलेगा। यह एक चक्र है जो पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने की क्षमता रखता है।

निष्कर्ष

Viksit Bharat – G RAM G Bill 2025 निसंदेह ग्रामीण भारत की एक नई तस्वीर पेश करने वाला कानून है। इसमें तकनीक और रोजगार का जो मेल किया गया है, वह इसे पुराने कानूनों से अलग बनाता है। 125 दिनों की गारंटी और पारदर्शी भुगतान प्रणाली इस योजना की सबसे बड़ी मजबूती है।

हालांकि, राज्यों के साथ फंड शेयरिंग और नाम का विवाद इसकी राह में कुछ चुनौतियां खड़ी कर सकता है। लेकिन अगर नीयत साफ रही और क्रियान्वयन सही ढंग से हुआ, तो यह कानून गांवों के विकास में मील का पत्थर साबित होगा। अंततः, देश का विकास तभी संभव है जब हमारे गांव आत्मनिर्भर और समृद्ध हों।

Related Disclaimer : यह समाचार रिपोर्ट Khabar Aangan Research Desk द्वारा 18 दिसंबर 2025 को लोकसभा की कार्यवाही, सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों और आधिकारिक दस्तावेजों के गहन विश्लेषण के बाद तैयार की गई है। इस कानून के नियम और लागू होने की प्रक्रिया राज्यवार अलग हो सकती है। किसी भी भ्रम की स्थिति में अपने स्थानीय पंचायत कार्यालय से आधिकारिक सूचना प्राप्त करें।

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