प्रस्तावना: जब शंकराचार्य की आँखों ने देखी दरभंगा गौशाला की दुर्दशा
हाल ही में, ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज अपनी ‘गौ मतदाता संकल्प यात्रा’ के दौरान दरभंगा के मिर्ज़ापुर स्थित ऐतिहासिक गौशाला पहुँचे । उनका यह दौरा कोई सामान्य आध्यात्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह एक ऐसे गहरे संकट पर राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने का एक महत्वपूर्ण क्षण था, जो दशकों से आस्था और सेवा की नींव को खोखला कर रहा है। शंकराचार्य ने जब परिसर का निरीक्षण किया, तो उनके मुख से निकले शब्द किसी शासकीय रिपोर्ट से कहीं अधिक प्रभावशाली थे। उन्होंने गौशाला की “दयनीय हालत” पर गहरी चिंता व्यक्त की ।
शंकराचार्य ने जो देखा, वह एक दुखद विरोधाभास था। उन्होंने कहा कि यह गौशाला शहर के ठीक बीचों-बीच स्थित है और इतनी विशाल है कि इसमें “लगभग एक हजार गायों की सेवा आराम से की जा सकती है” । इसके बावजूद, इसकी वर्तमान स्थिति “बेहद दयनीय” है, जिसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है । यह केवल एक संत की वेदना नहीं थी, बल्कि एक ऐसी संस्था के पतन पर एक तीखी टिप्पणी थी, जो कभी मिथिला के गौरव का प्रतीक थी। उनका यह दौरा और उनकी स्पष्टवादिता इस संस्था से जुड़े एक मौलिक प्रश्न को जन्म देती है: 1886 में दरभंगा राज के संरक्षण में स्थापित और अपार संपत्ति से संपन्न यह पूजनीय संस्था आज विनाश के कगार पर कैसे पहुँच गई?
यह खोजी रिपोर्ट इसी प्रश्न की गहराइयों में उतरती है। यह केवल गायों की दुर्दशा का दस्तावेजीकरण नहीं है, बल्कि उस संगठित भ्रष्टाचार, प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक खोखलेपन की परतों को उजागर करने का एक प्रयास है, जिसने मिलकर इस पवित्र धरोहर को नष्ट कर दिया है। शंकराचार्य का हस्तक्षेप एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है, जो इस मुद्दे को स्थानीय प्रशासनिक विफलता के दायरे से निकालकर एक व्यापक राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही के मंच पर ले आता है। उनकी “गौ-मतदाता” की अपील सीधे तौर पर गौ-सेवा की स्थिति को चुनावी कसौटी से जोड़ती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अब इस उपेक्षा को और अधिक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता । यह रिपोर्ट तथ्यों के आधार पर विश्लेषण करेगी कि कैसे एक पवित्र संस्था को व्यवस्थित रूप से लूटा जा रहा है और कैसे प्रशासन की चुप्पी इस अपराध में एक मूक भागीदार बन गई है।
अध्याय 1: एक गौरवशाली अतीत की धुंधली यादें
दरभंगा की मिर्ज़ापुर गौशाला का इतिहास केवल एक पशु आश्रय का इतिहास नहीं है, बल्कि यह मिथिलांचल की गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का एक जीवंत प्रमाण है। इसकी स्थापना वर्ष 1886 में गौ-सेवा के पवित्र उद्देश्य के साथ की गई थी, और इसे दरभंगा राज का पूर्ण संरक्षण प्राप्त था । उस दौर में, यह संस्था केवल बिहार में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में एक मिसाल थी। स्थानीय लोगों और पुराने दस्तावेजों के अनुसार, यह एक ऐसा समय था जब गौशाला में “दूध-दही की नदियां बहा करती थीं” । यह महज एक कहावत नहीं, बल्कि उस समृद्धि और आत्मनिर्भरता का प्रतीक थी, जो उचित प्रबंधन और संरक्षण के कारण संभव हुई थी।
दरभंगा राज ने इस संस्था को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रचुर मात्रा में संपत्ति दान की थी। इसके पास आज भी लगभग 45 से 46 बीघा बेशकीमती ज़मीन है, जो इसे स्थायी संपत्ति के मामले में देश की सबसे धनी गौशालाओं में से एक बनाती है । यह संपत्ति गौशाला के संचालन, गौवंश के भरण-पोषण और विकास के लिए दी गई थी, ताकि यह संस्था कभी किसी पर निर्भर न रहे। उस समय, इसका प्रबंधन इतना उत्कृष्ट था कि यह न केवल सैकड़ों गायों का घर था, बल्कि यह नस्ल सुधार और डेयरी उत्पादन का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी था।