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लोकतंत्र और संवादहीनता: क्या हम फिर से गुलाम हो रहे हैं?

जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के साथ हुआ बर्ताव भारतीय लोकतंत्र में घटते संवाद का प्रतीक है। क्या प्रशासनिक संवेदनहीनता, पेपर लीक और बढ़ता कर का बोझ हमें फिर से औपनिवेशिक दौर की ओर धकेल रहा है? पढ़ें एक गहन और शोधपूर्ण संपादकीय।
Ashutosh Kumar Jha Published on: 18 जुलाई 2026
लोकतंत्र और संवादहीनता: क्या हम फिर से गुलाम हो रहे हैं?
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नई दिल्ली | 18 जुलाई 2026: नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में जो दृश्य देश ने देखा, वह केवल एक सामान्य पुलिसिया कार्रवाई नहीं थी। वह एक आजाद और संप्रभु देश में नागरिक अधिकारों के जनाजे का दृश्य था। जब 59 वर्षीय विश्वविख्यात शिक्षाविद् और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को उनके शांतिपूर्ण अनशन के 21वें दिन पुलिस बल द्वारा जबरन उठाकर अस्पताल ले जाया गया, तो यह केवल एक व्यक्ति को धरना स्थल से हटाना नहीं था, बल्कि यह उस हर आवाज का गला घोंटना था, जो सत्ता से एक सवाल पूछने की जुर्रत करती है।

आज हर संवेदनशील भारतीय के दिल में एक बहुत गहरा और टीस देने वाला सवाल उठ रहा है: क्या भारत का लोकतंत्र और संवादहीनता का यह नया मॉडल हमें वापस उस खौफनाक ब्रिटिश औपनिवेशिक युग में धकेल रहा है, जहां से निकलने के लिए हमारे पुरखों ने अपना लहू बहाया था?

आज हालात इतने हृदयविदारक हो चुके हैं कि देश का एक प्रतिष्ठित नागरिक, जिसने अपना पूरा जीवन राष्ट्र निर्माण और हिमालय की रक्षा में लगा दिया, वह खुले आसमान के नीचे हफ्तों से भूखा-प्यासा बैठा रहा, लेकिन इस विशाल लोकतांत्रिक सरकार का एक भी नुमाइंदा उनसे बात करने नहीं आया। क्या हमारी व्यवस्था इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि 21 दिनों तक भूखे-प्यासे बैठे एक प्रतिष्ठित नागरिक से बात करने के लिए किसी भी जिम्मेदार नीति-निर्माता के पास वक्त नहीं है?

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सोनम वांगचुक अनशन: कारण, भूगोल और संवैधानिक अधिकार

इस पूरे मुद्दे को गहराई से समझने के लिए हमें सोनम वांगचुक अनशन के मूल कारणों और उसकी पृष्ठभूमि का तटस्थ विश्लेषण करना होगा। यह अनशन केवल एक व्यक्ति की जिद नहीं थी। यह हाल ही में सामने आई NEET परीक्षा की अनियमितताओं, पेपर लीक और देश के लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़े शिक्षा व्यवस्था के संकट के खिलाफ एक संस्थागत जवाबदेही (Institutional Accountability) की मांग थी।

इससे पहले भी वांगचुक ने लद्दाख की नाजुक भौतिक भूगोल (Physical Geography), वहां के ग्लेशियरों और सिंधु व श्योक जैसी नदी घाटियों के पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए लंबा संघर्ष किया है। उनकी मांगें भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule – Article 244) के तहत लद्दाख को जनजातीय स्वायत्तता और पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने पर केंद्रित रही हैं, ताकि वहां के प्राकृतिक संसाधनों को अनियंत्रित दोहन से बचाया जा सके।

भारत का संविधान, जो विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है, अपने अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत हर नागरिक को शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मेलन का मौलिक अधिकार देता है। लेकिन जब छात्र अपने भविष्य के लिए, शिक्षक अपने अधिकारों के लिए, या कोई नागरिक पर्यावरण के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करता है, तो उसे संवाद के बजाय बल प्रयोग या पुलिसिया कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। यह प्रशासनिक रवैया संवैधानिक भावना के विपरीत है।

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