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जब देश आज़ाद हुआ था: शून्य से शक्ति तक भारत का सफर

15 अगस्त 1947 को हमने एक टूटी हुई विरासत संभाली—मात्र 32 वर्ष की जीवन प्रत्याशा, 12% साक्षरता और औपनिवेशिक लूट से खाली खजाना। इस गहन लेख में जानें कि कैसे नेहरू और शुरुआती सरकारों ने पूंजी की कमी के बावजूद IITs, ISRO और हरित क्रांति की नींव रखकर आधुनिक भारत...
Khabar Aangan Published on: 12 नवम्बर 2025

I. परिचय: स्वतंत्रता का भीषण सूर्योदय

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15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का उद्घोष नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसे राष्ट्र के जन्म का क्षण था जिसने सदियों के औपनिवेशिक शोषण के बाद टूटी-फूटी विरासत को संभाला था। यह स्वतंत्रता ‘संकल्प’ और ‘शून्य’ के बीच खड़ी थी। नेताओं के समक्ष एक तरफ लोकतंत्र का आदर्श था, तो दूसरी ओर एक ऐसा देश जो गरीबी, भुखमरी, और विभाजन की विभीषिका से झुलस रहा था। उस दौर के नेताओं ने जिन नीतियों को अपनाया, वे महज वैचारिक चुनाव नहीं थे, बल्कि वे राष्ट्र के अस्तित्व को बचाने की अनिवार्य मजबूरियाँ थीं।

यह रिपोर्ट भारत की 75 वर्षों की यात्रा का तथ्यात्मक और भावनात्मक लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। इसका उद्देश्य उस भयंकर चुनौती को समझना है जिससे शुरुआती सरकारों को जूझना पड़ा, और यह दर्शाना है कि कैसे उन्होंने शून्य से शुरुआत करके, संस्थानों की नींव रखकर, और अडिग संकल्प के साथ भारत को आज की वैश्विक शक्ति बनाया। यह सफर न केवल संघर्षों की कहानी है, बल्कि यह मानव इतिहास में राष्ट्रीय उत्थान की एक अमर गाथा है।

II. विरासत में मिली विभीषिका: 1947 में भारत की स्थिति

2.1. अंग्रेजों ने भारत को कैसा छोड़ा था? औपनिवेशिक शोषण का गहरा घाव

भारत को स्वतंत्रता एक खाली खजाने के साथ मिली थी। औपनिवेशिक शासन की पहचान ‘ड्रेन ऑफ वेल्थ’ (धन की निकासी) थी, जिसने देश को पूंजी विहीन कर दिया। दादाभाई नौरोजी ने अनुमान लगाया था कि ब्रिटिश शासन के विभिन्न चरणों में सालाना ₹8 करोड़ से ₹30 करोड़ तक की धनराशि भारत से बाहर भेजी गई, जो राष्ट्रीय आय का 6-7% हिस्सा था । यह वित्तीय निकासी भारत में पूंजी निर्माण (Capital Formation) और जीवन स्तर पर गंभीर रूप से नकारात्मक प्रभाव डाल रही थी। 

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आर्थिक इतिहासकारों के आधुनिक अनुमान इस नुकसान की भयावहता को दर्शाते हैं। यदि 1765 से 1900 तक हुई धन की निकासी को 2020 तक संचित किया जाए, तो यह राशि $64.82 ट्रिलियन के चौंका देने वाले आंकड़े तक पहुंच जाती है । यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत में निजी क्षेत्र के पास 1947 में बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश के लिए पूंजी जमा ही नहीं हो पाई थी, क्योंकि यह पूंजी व्यवस्थित रूप से उपनिवेशी ‘होम चार्जेज’ के रूप में लूटी जा चुकी थी। इस अभूतपूर्व पूंजी संकट ने यह तय कर दिया था कि स्वतंत्रता के बाद निजी क्षेत्र द्वारा त्वरित औद्योगिक विकास करना असंभव था, और इसलिए राष्ट्र की आर्थिक मशीनरी को गति देने के लिए राज्य के हस्तक्षेप और नियंत्रण की आवश्यकता अनिवार्य हो गई थी।   

2.1.1. व्यवस्थित वि-औद्योगीकरण (Systemic De-industrialization)

ब्रिटिश नीतियों ने भारत के स्थापित औद्योगिक ढांचे को जानबूझकर नष्ट किया। विशेष रूप से 1810 से 1860 के दशक में, भारत ने अपने घरेलू कपड़ा बाजार का एक बड़ा हिस्सा ब्रिटेन के पक्ष में खो दिया। यह ब्रिटेन में कारखाने-आधारित उत्पादकता में तेजी से वृद्धि और भारत पर मुक्त व्यापार प्रतिबद्धता थोपने के संयुक्त प्रभाव के कारण हुआ । भारत को केवल कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता और ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं का बाजार बना दिया गया। 1947 में देश को जो कुछ मिला, वह एक ऐसी अर्थव्यवस्था थी जो कृषि पर अत्यधिक निर्भर थी और जहां बेरोजगारी और आर्थिक समस्याएं चरम पर थीं ।   

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