बिहार की राजनीति एक निर्णायक चौराहे पर खड़ी है। एक तरफ, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का युवा नेतृत्व तेजस्वी यादव के बैनर तले ‘नौकरी’ और संस्थागत सुधार का एक आधुनिक, विकासात्मक एजेंडा पेश कर रहा है। वहीं दूसरी ओर, पार्टी के मुख्य आधार का एक शक्तिशाली हिस्सा अभी भी ‘रंगदारी’ (दबंगई और आपराधिक प्रभुत्व) की उस विरासत में अपनी पहचान की सुरक्षा और सामाजिक उत्कर्ष की तलाश कर रहा है, जिसने 1990 के दशक को परिभाषित किया था।
यह द्वंद्व बिहार के सामाजिक-राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर नैतिक संकट प्रस्तुत करता है। राजनीतिक संगीत और नारों के माध्यम से उभरती यह मानसिकता, जिसका सार ‘RJD सरकार बनेगी तो यादव रंगदार बनेंगे’ की धारणा में निहित है, उस ‘मानसिक पतन’ और ‘नैतिक विकलांगता’ का स्पष्ट संकेत है जहाँ संस्थागत रास्ते (योग्यता और कानून) को जबरन, अतिरिक्त-कानूनी शक्ति (बाहुबल) से प्रतिस्थापित किया जाता है।
यह संपादकीय RJD के भीतर पनप रहे इस विरोधाभास, इसकी ऐतिहासिक जड़ों और सबसे महत्वपूर्ण—पार्टी के नेतृत्व द्वारा इस आक्रामक विचारधारा के प्रति अपनाई गई रणनीतिक निष्क्रियता पर प्रकाश डालता है।
‘रंगदारी’ की मानसिकता: प्रभुत्व का सांस्कृतिक दावा
बिहार का चुनावी संघर्ष अब केवल विकास नीतियों पर नहीं लड़ा जा रहा है, बल्कि यह सांस्कृतिक दावों और जातीय प्रभुत्व की खुली आकांक्षाओं पर भी टिका है। जब आक्रामक राजनीतिक संगीत और नारे स्पष्ट रूप से अवैध हथियारों के प्रयोग और अपहरण की धमकी को महिमामंडित करते हैं, तो यह सीधे तौर पर कानून और व्यवस्था के प्रति घोर उपेक्षा प्रदर्शित करता है।
‘यादव रंगदार बनेंगे’ की भावना का मूल संदेश यह है कि सत्ता में वापसी पर, राज्य तंत्र लोकतांत्रिक मानदंडों के बजाय दबंगों के कानून के तहत काम करेगा । यह सामाजिक न्याय का दावा नहीं है; यह प्रतिद्वंद्वियों को डराने-धमकाने और एक विशेष जाति को राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व प्रदान करने का एक खुला आह्वान है ।
