Suchna Se Sacchai Tak
ADVERTISEMENT

IN FOCUS

Advertisement
  1. Home
  2. Editorials
  3. ‘RJD सरकार बनेगी तो यादव रंगदार बनेंगे’? : बिहार की नैतिक त्रासदी: ‘नौकरी’ के वादे पर ‘रंगदारी’ की छाया

‘RJD सरकार बनेगी तो यादव रंगदार बनेंगे’? : बिहार की नैतिक त्रासदी: ‘नौकरी’ के वादे पर ‘रंगदारी’ की छाया

बिहार चुनाव में वायरल भोजपुरी गानों ने जाति आधारित राजनीति को नई हवा दी है। "RJD सरकार बनतो, यादव रंगदार बनतो” जैसे गीतों से राजनीतिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया प्रभाव और जनता की मनोवैज्ञानिक सोच में भारी बदलाव आ रहा है। पढ़िए एक विश्लेषण जो राजनीति, समाज और संस्कृति को एक...
Khabar Aangan Published on: 8 नवम्बर 2025
‘RJD सरकार बनेगी तो यादव रंगदार बनेंगे’? : बिहार की नैतिक त्रासदी: ‘नौकरी’ के वादे पर ‘रंगदारी’ की छाया
ADVERTISEMENT

बिहार की राजनीति एक निर्णायक चौराहे पर खड़ी है। एक तरफ, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का युवा नेतृत्व तेजस्वी यादव के बैनर तले ‘नौकरी’ और संस्थागत सुधार का एक आधुनिक, विकासात्मक एजेंडा पेश कर रहा है। वहीं दूसरी ओर, पार्टी के मुख्य आधार का एक शक्तिशाली हिस्सा अभी भी ‘रंगदारी’ (दबंगई और आपराधिक प्रभुत्व) की उस विरासत में अपनी पहचान की सुरक्षा और सामाजिक उत्कर्ष की तलाश कर रहा है, जिसने 1990 के दशक को परिभाषित किया था।

यह द्वंद्व बिहार के सामाजिक-राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर नैतिक संकट प्रस्तुत करता है। राजनीतिक संगीत और नारों के माध्यम से उभरती यह मानसिकता, जिसका सार ‘RJD सरकार बनेगी तो यादव रंगदार बनेंगे’ की धारणा में निहित है, उस ‘मानसिक पतन’ और ‘नैतिक विकलांगता’ का स्पष्ट संकेत है जहाँ संस्थागत रास्ते (योग्यता और कानून) को जबरन, अतिरिक्त-कानूनी शक्ति (बाहुबल) से प्रतिस्थापित किया जाता है।

ADVERTISEMENT

यह संपादकीय RJD के भीतर पनप रहे इस विरोधाभास, इसकी ऐतिहासिक जड़ों और सबसे महत्वपूर्ण—पार्टी के नेतृत्व द्वारा इस आक्रामक विचारधारा के प्रति अपनाई गई रणनीतिक निष्क्रियता पर प्रकाश डालता है।


‘रंगदारी’ की मानसिकता: प्रभुत्व का सांस्कृतिक दावा

बिहार का चुनावी संघर्ष अब केवल विकास नीतियों पर नहीं लड़ा जा रहा है, बल्कि यह सांस्कृतिक दावों और जातीय प्रभुत्व की खुली आकांक्षाओं पर भी टिका है। जब आक्रामक राजनीतिक संगीत और नारे स्पष्ट रूप से अवैध हथियारों के प्रयोग और अपहरण  की धमकी को महिमामंडित करते हैं, तो यह सीधे तौर पर कानून और व्यवस्था के प्रति घोर उपेक्षा प्रदर्शित करता है।   

ADVERTISEMENT

‘यादव रंगदार बनेंगे’ की भावना का मूल संदेश यह है कि सत्ता में वापसी पर, राज्य तंत्र लोकतांत्रिक मानदंडों के बजाय दबंगों के कानून के तहत काम करेगा । यह सामाजिक न्याय का दावा नहीं है; यह प्रतिद्वंद्वियों को डराने-धमकाने और एक विशेष जाति को राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व प्रदान करने का एक खुला आह्वान है ।   

यह मानसिकता उस मनोवैज्ञानिक अवस्था को दर्शाती है जहाँ पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों पर स्थिति और भय-लाभ प्राप्त करने के लिए संस्थागत मार्गों को खारिज कर दिया जाता है। इस दृष्टिकोण में, ताकत सुरक्षा का प्रतीक बन जाती है—यह प्रतिद्वंद्वियों (दलितों, उच्च जातियों, या अन्य हाशिए के समूहों) को संकेत देता है कि शक्ति का संतुलन अब जबरदस्ती से लागू होगा ।   

ADVERTISEMENT

‘कट्टा’ और ‘अपहरण’ का प्रतीकात्मक विखंडन

जब राजनीतिक गीतों में स्पष्ट रूप से ‘कट्टा’ (स्थानीय पिस्तौल)  चलाने और ‘उठा लेबो रे’ (अपहरण कर लेंगे या जबरन कब्जा कर लेंगे)  जैसे प्रतीकों का उपयोग होता है, तो यह केवल मनोरंजन नहीं रह जाता। ये शब्द दो महत्वपूर्ण बातें दर्शाते हैं:   

  1. आपराधिक शक्ति का महिमामंडन: ‘कट्टा’ संस्थागत अधिकार (पुलिस या न्यायालय) के विपरीत, कच्चे, गैर-कानूनी जबरदस्ती का प्रतीक बन जाता है। यह इस विश्वास को मजबूत करता है कि सत्ता में आने पर, दबंगों का कानून चलेगा।
  2. जातीय प्रभुत्व की आकांक्षा: राजनीतिक टिप्पणीकार इस बात पर जोर देते हैं कि इस तरह की धमकी का उद्देश्य अन्य समुदायों में भय पैदा करना है। यह संदेश देता है कि सत्ता में आने पर, केवल एक विशेष जाति की ‘चलेगी’ , जो सामाजिक न्याय के समावेशी सिद्धांतों से परे जाकर, एक जाति विशेष के लिए खुले तौर पर राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व की मांग को स्थापित करता है।   

इस प्रकार, ‘रंगदारी’ (दबंगई) की यह मानसिकता राजनीतिक स्थिति और संसाधन निष्कर्षण के लिए अपराध को एक उपकरण के रूप में सामान्य करती है।

ऐतिहासिक मजबूरी: संरक्षणवाद और शासन की अक्षमता

इस ‘रंगदारी’ मानसिकता की गहरी जड़ें लालू प्रसाद के 1990 से 2005 तक के 15 साल के शासनकाल में हैं। विद्वानों के शोध (आईएएस अधिकारी ए. संतोष मैथ्यू और राजनीतिक अर्थशास्त्री मिक मूर) ने तर्क दिया कि उस अवधि के दौरान हुई प्रशासनिक और शासन की गिरावट जानबूझकर और रणनीतिक थी—जिसे ‘डिजाइन द्वारा राज्य अक्षमता’ कहा गया ।

लालू प्रसाद ने जानबूझकर राज्य संस्थानों को कमजोर किया, जैसे कि सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों को खाली रखना, क्योंकि योग्य आवेदक अक्सर उच्च जातियों से संबंधित होते थे । इस अक्षमता का उद्देश्य उच्च-जाति-वर्चस्व वाले नौकरशाही तंत्र को दरकिनार करना था।

संरक्षणवाद का जन्म: जब औपचारिक संस्थान योग्यता या कानून के आधार पर संसाधन देने में विफल होते हैं, तो शक्ति और भौतिक संसाधनों तक पहुंचने का रास्ता व्यक्तिगत, अनौपचारिक संरक्षण (Patronage) में स्थानांतरित हो जाता है । ‘रंगदारी’ की मानसिकता इसी ऐतिहासिक वास्तविकता की तार्किक परिणति है: यदि राज्य न्याय और संसाधन नहीं दे सकता है, तो उन्हें छीनने के लिए गैर-राज्य साधन (बाहुबल) एक कार्यात्मक विकल्प बन जाते हैं।

राजद (RJD) की रणनीतिक निष्क्रियता: चुप्पी का कारण

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि तेजस्वी यादव सचमुच ‘जंगल राज’ के आख्यान का मुकाबला करके स्वच्छ शासन की स्थापना चाहते हैं, तो पार्टी आक्रामक बाहुबल की बयानबाजी के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं करती?

राजद की निष्क्रियता को एक रणनीतिक मजबूरी के रूप में देखा जाता है:

  1. कोर वोटर की अपेक्षाएं: RJD को पता है कि उसके पारंपरिक आधार का एक बड़ा हिस्सा आज भी कानूनी सुरक्षा या विकास की बजाय तत्काल संरक्षण, सामाजिक दावा और दण्ड मुक्ति चाहता है। इस ‘रंगदारी’ अपील को पूरी तरह से खारिज करने का मतलब इस कोर आधार को नाराज करना है, जो पार्टी के लिए चुनावी जोखिम पैदा करेगा।
  2. बाहुबली उम्मीदवारों का समर्थन: पार्टी कुख्यात आपराधिक तत्वों से जुड़े उम्मीदवारों, जैसे कि मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब , को मैदान में उतारना जारी रखती है। यह कदम, पारंपरिक गढ़ों को मजबूत करने के लिए उठाया गया, आधुनिक, नौकरी-केंद्रित आख्यान को सीधे तौर पर कमजोर करता है और भाजपा की ‘जंगल राज’ की चेतावनी को बल देता है ।   
  3. आंतरिक नैतिक पतन: पार्टी के भीतर टिकट वितरण को लेकर सार्वजनिक कलह, पैसे लेकर टिकट बेचने के आरोप , और नेताओं की बेलगाम बयानबाजी  यह दर्शाती है कि आंतरिक संरचनाएं अभी भी संरक्षण मॉडल (शक्ति/लाभ) को वैचारिक सामंजस्य या सार्वजनिक सेवा के जनादेश पर प्राथमिकता देती हैं।   

संक्षेप में, राजद (RJD) ‘नौकरी’ का वादा करके युवा आकांक्षाओं को आकर्षित करने की कोशिश करता है, लेकिन वह ‘रंगदारी’ तत्वों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता क्योंकि उसे डर है कि ऐसा करने से उसका वफादार, दबंग आधार टूट सकता है। यह चुप्पी इस बात की पुष्टि है कि आंतरिक रूप से, संरक्षण मॉडल अभी भी नीति मॉडल पर हावी है।

राजद (RJD) का विरोधाभास: कार्रवाई क्यों नहीं?

यह एक केंद्रीय प्रश्न है: यदि तेजस्वी यादव एक ‘नौकरी राज’ की स्थापना करना चाहते हैं और ‘जंगल राज’ के लेबल का सक्रिय रूप से मुकाबला करते हैं, तो पार्टी इस तरह के आक्रामक सांस्कृतिक आउटपुट (गीतों) और ‘बाहुबली’ नेताओं के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं करती है?

विश्लेषण बताता है कि राजद की निष्क्रियता एक रणनीतिक मजबूरी है:

  1. मूल आधार की संतुष्टि: ‘कट्टा’ मानसिकता राजद के पारंपरिक और प्रभुत्वशाली पिछड़ी जाति के आधार का एक शक्तिशाली हिस्सा है। ये समूह राजद की सत्ता को अपनी सामाजिक स्थिति के उत्थान के समय के रूप में देखते हैं। यदि पार्टी इस ‘रंगदारी’ अपील को पूरी तरह से खारिज कर देती है, तो वह इन कोर मतदाताओं की पहचान की सुरक्षा और संरक्षण की अपेक्षा  को संतुष्ट नहीं कर पाएगी।   
  2. बाहुबली उम्मीदवारों का समर्थन: राजद राजनीतिक रूप से विरोधाभासी कदम उठाते हुए, कुख्यात आपराधिक तत्वों से जुड़े उम्मीदवारों, जैसे कि मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब , को मैदान में उतारना जारी रखता है। यह रणनीतिक कदम (परंपरागत गढ़ों को मजबूत करने के लिए) आधुनिक आख्यान को सीधे तौर पर कमजोर करता है और भाजपा की ‘जंगल राज’ की चेतावनी को बल देता है ।   
  3. आंतरिक अनुशासन का अभाव: पार्टी के भीतर आंतरिक संघर्ष और अनुशासनहीनता के प्रमाण भी मिलते हैं, जैसे कि सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन, टिकट बेचने के आरोप, और नेताओं द्वारा मनमाने ढंग से मीडिया में बयानबाजी । यह नैतिक संकट यह सिद्ध करता है कि पार्टी की आंतरिक संरचनाएं अभी भी संरक्षण मॉडल (शक्ति और लाभ) को वैचारिक सामंजस्य और विकास सिद्धांतों पर प्राथमिकता देती हैं।   

संक्षेप में, राजद (RJD) ‘नौकरी’ की बात इसलिए करता है क्योंकि युवा मतदाता विकास चाहते हैं, लेकिन वह ‘रंगदारी’ तत्वों को इसलिए नहीं हटाता क्योंकि उसे लगता है कि उसके मूल आधार को संतुष्ट रखने और ‘जंगल राज’ के डर से अन्य समुदायों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखने के लिए बाहुबल के प्रतीकों की आवश्यकता है।

निष्कर्ष: विश्वसनीयता का संकट

यह राजनीतिक दुविधा राजद (RJD) के लिए विश्वसनीयता का संकट पैदा करती है। एक तरफ, तेजस्वी यादव ने ‘नौकरी’ और विकास का जो परिवर्तनकारी वादा किया है , वह राज्य को ‘डिजाइन द्वारा अक्षमता’ से बाहर निकालकर संस्थागत विश्वास बहाल करने की मांग करता है। दूसरी तरफ, ‘रंगदारी’ की मानसिकता का निरंतर प्रचार और उसके समर्थकों पर कार्रवाई न करने का निर्णय सक्रिय रूप से निवेश, स्थिरता और कानून के शासन को हतोत्साहित करता है।   

जब तक राजद (RJD) आक्रामक सांस्कृतिक आउटपुट को अस्वीकार करके, आंतरिक अनुशासन लागू करके , और बाहुबली हस्तियों के साथ गठबंधन समाप्त करके  ‘रंगदारी’ आख्यान पर अपनी राजनीतिक निर्भरता को निर्णायक रूप से समाप्त नहीं करता, तब तक ‘नौकरी राज’ का वादा ‘जंगल राज’ के बढ़ते खतरे से घिरा रहेगा। बिहार का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि मतदाता इन दो परस्पर विरोधी राजनीतिक वास्तविकताओं में से किसे चुनते हैं।

डिस्क्लेमर

यह लेख उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी, राजनीतिक टिप्पणियों, और सामाजिक-सांस्कृतिक आख्यानों पर आधारित एक संपादकीय और विश्लेषणात्मक प्रस्तुति है।

  1. विश्लेषण का उद्देश्य: इस लेख का उद्देश्य बिहार की राजनीति में व्याप्त विरोधाभासी प्रवृत्तियों, विशेष रूप से ‘बाहुबल’ की विरासत और आधुनिक ‘विकास’ की राजनीति के टकराव का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करना है।
  2. तथ्यात्मक आधार: इसमें उद्धृत ऐतिहासिक और समकालीन संदर्भ (जैसे ‘डिजाइन द्वारा राज्य अक्षमता’, ‘संरक्षणवाद’ और राजनीतिक गीतों/नारों के निहितार्थ) विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों, मीडिया रिपोर्ट्स और विद्वानों के शोध पर आधारित हैं।
  3. पक्षपात का अभाव: यह संपादकीय किसी भी राजनीतिक दल (जैसे राष्ट्रीय जनता दल या उसके प्रतिद्वंद्वी दलों) का समर्थन करने या उसे बदनाम करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है।
  4. शब्दावली का उपयोग: लेख में ‘मानसिक पतन’, ‘नैतिक विकलांगता’ और ‘रंगदारी’ जैसे शब्दों का प्रयोग राजनीतिक समाजशास्त्र और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के संदर्भ में किया गया है, न कि किसी व्यक्ति या समुदाय पर व्यक्तिगत आरोप लगाने के इरादे से।
  5. लेखक की राय: इसमें व्यक्त विचार पूरी तरह से राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण पर आधारित हैं और इन्हें किसी भी समूह के खिलाफ अंतिम निर्णय या व्यक्तिगत दुर्भावना नहीं माना जाना चाहिए।
इस खबर को शेयर करें
Khabar Aangan

Khabar Aangan Admin

Khabar Aangan एक स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म है, जो सूचना से सच्चाई तक की यात्रा को समर्पित है। हमारा उद्देश्य है—स्थानीय मुद्दों से लेकर राष्ट्रीय घटनाओं तक, हर खबर को गहराई, संदर्भ और निष्पक्षता के साथ प्रस्तुत करना। हम परंपरागत पत्रकारिता को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ते हैं, ताकि पाठकों को मिले स्पष्ट, विश्वसनीय और प्रभावशाली जानकारी। चाहे बात हो प्रशासनिक विफलता की, या सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता की, या सामाजिक बदलाव की—Khabar Aangan हर विषय को संवेदनशीलता और साहस के साथ उठाता है।

आपका छोटा सा सहयोग हमारी पत्रकारिता को नई मजबूती देता है।

GPay UPI Paytm AmazonPay Razorpay

WELCOME TO KHABAR AANGAN Suchna Se Sacchai Tak