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Sankalp Series Review: नाना पाटेकर के OTT डेब्यू और प्रकाश झा की ‘चाणक्य नीति’ ने जीता दिल, लेकिन 8 घंटे की लंबाई ने किया निराश

Sankalp Series Review: नाना पाटेकर के OTT डेब्यू और प्रकाश झा की ‘चाणक्य नीति’ ने जीता दिल, लेकिन 8 घंटे की लंबाई ने किया निराश

Khabar Aangan Published on: 11 मार्च 2026
Sankalp Series Review: नाना पाटेकर के OTT डेब्यू और प्रकाश झा की ‘चाणक्य नीति’ ने जीता दिल, लेकिन 8 घंटे की लंबाई ने किया निराश
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मुंबई | 11 मार्च 2026: राजनीति की बिसात पर जब ‘गुरु’ और ‘शिष्य’ एक-दूसरे के आमने-सामने हों, तो सत्ता का खेल बेहद खौफनाक हो जाता है। 11 मार्च को अमेज़ॅन एमएक्स प्लेयर (Amazon MX Player) पर रिलीज हुई प्रकाश झा की नई Sankalp Series इसी राजनीतिक दांव-पेंच और सत्ता के खूनी संघर्ष की एक बेहतरीन कहानी है।

‘आश्रम’ और ‘राजनीति’ जैसी शानदार सौगात देने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक प्रकाश झा ने एक बार फिर भारतीय राजनीति की काली सच्चाई को पर्दे पर उतारा है। यह सीरीज विशेष रूप से इसलिए भी भारी चर्चा में है क्योंकि इसके जरिए दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर ने ओटीटी (OTT) की दुनिया में अपना धमाकेदार डेब्यू किया है।

कहानी: ‘चाणक्य-चंद्रगुप्त’ का आधुनिक और खौफनाक रूप

इस वेब सीरीज की पूरी कहानी प्राचीन भारत के चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य के ऐतिहासिक वृत्तांत से प्रेरित है। लेकिन इसे आधुनिक भारत के राजनीतिक परिदृश्य और नौकरशाही में बड़ी ही चतुराई और गंभीरता के साथ बुना गया है। इस कहानी में रणभूमि की जगह बंद कमरों में होने वाली गुप्त राजनीतिक बैठकों ने ले ली है।

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नाना पाटेकर ने इस सीरीज में ‘माट साब’ (कन्हैयालाल) का एक बेहद शक्तिशाली और रहस्यमयी किरदार निभाया है। वह एक ऐसा मास्टर-माइंड और राजनीतिक रणनीतिकार है, जो कोई चुनाव लड़े बिना पर्दे के पीछे से पूरी सरकार और व्यवस्था को अपने इशारों पर नचाता है।

कहानी में असली मोड़ तब आता है जब माट साब का सबसे वफादार और होनहार शिष्य आदित्य वर्मा (मोहम्मद जीशान अय्यूब) अपने गुरु की तानाशाही के खिलाफ बगावत कर देता है। गुरु और शिष्य की यह वैचारिक और राजनीतिक जंग दर्शकों को अंत तक बांधे रखने का प्रयास करती है।

प्रकाश झा का ‘यथार्थवादी’ सिनेमा

प्रकाश झा बॉलीवुड के उन गिने-चुने फिल्मकारों में से हैं जो ‘मास-अपीलिंग’ (Mass-appealing) और जमीनी कहानियां कहने में माहिर हैं। ओटीटी के इस आधुनिक दौर में जहां ज्यादातर शोज़ एक खास ‘एलीट’ वर्ग को ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं, वहीं झा सीधे आम जनता के मुद्दों से जुड़ते हैं।

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