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भारत में मंडरा रहा ‘Super El Nino’ का भयंकर खतरा: इस साल पड़ेगी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, मानसून पर भी संकट

यूरोपीय मौसम एजेंसी ने इस साल 'सुपर El Nino' आने की गंभीर चेतावनी जारी की है। इसके असर से भारत में भयंकर हीटवेव और कमजोर मानसून का खतरा मंडरा रहा है, लेकिन आखिर प्रशांत महासागर में हो रहा यह बदलाव हमारे देश को कैसे झुलसाने वाला है?
Khabar Aangan Published on: 14 मार्च 2026
भारत में मंडरा रहा ‘Super El Nino’ का भयंकर खतरा: इस साल पड़ेगी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, मानसून पर भी संकट
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नई दिल्ली | 14 मार्च 2026: दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों ने एक बेहद डराने वाली और गंभीर जलवायु चेतावनी जारी की है। इस नई चेतावनी के अनुसार, हमारी पृथ्वी बहुत जल्द एक शक्तिशाली जलवायु चक्र में प्रवेश करने वाली है, जिसे ‘सुपर El Nino‘ (Super El Nino) कहा जा रहा है।

यूरोपीय सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट (ECMWF) के नवीनतम और बेहद सटीक डेटा ने इस बात की पुष्टि की है कि इस साल एक भयंकर जलवायु परिवर्तन होने वाला है। इसके असर से न सिर्फ पूरी दुनिया का मौसम चक्र बिगड़ेगा, बल्कि भारत को भी भीषण गर्मी का सामना करना पड़ सकता है।

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मौसम पूर्वानुमान मॉडल स्पष्ट रूप से दिखा रहे हैं कि जून महीने तक महासागर और वायुमंडल के संकेत एक साथ अलाइन (Align) होने लगेंगे। यह इस बात का सबसे मजबूत और शुरुआती संकेत है कि प्रशांत महासागर में यह खतरनाक मौसमी परिघटना बहुत तेजी से विकसित हो रही है।

आखिर क्या होता है यह El Nino प्रभाव?

सामान्य मौसमी परिस्थितियों में, ‘ट्रेड विंड्स’ (व्यापारिक हवाएं) गर्म सतह वाले पानी को दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं। इसी दौरान दक्षिण अमेरिका के तटों के पास समुद्र के नीचे से ठंडा पानी ऊपर की ओर आता है, जो एक संतुलित जलवायु चक्र बनाए रखता है।

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लेकिन, जब El Nino की स्थिति उत्पन्न होती है, तो ये व्यापारिक हवाएं अचानक से बहुत कमजोर पड़ जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप, समुद्र का गर्म पानी प्रशांत महासागर में पूर्व की ओर फैलने लगता है, जिससे मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के सतह का तापमान सामान्य से कहीं अधिक गर्म हो जाता है।

इस बड़े बदलाव का सीधा असर वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण पर पड़ता है। प्रशांत क्षेत्र में गर्म हवाएं ऊपर उठती हैं और वहां भारी बारिश होती है। वहीं इसके विपरीत, हिंद महासागर और अफ्रीका के कई हिस्सों में हवाएं नीचे की ओर बैठती हैं, जिससे वहां बारिश कम होती है और तापमान तेजी से बढ़ने लगता है।

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भारत के लिए क्यों बज रही है खतरे की घंटी?

भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से ग्रीष्मकालीन मानसून पर निर्भर करती है। ऐतिहासिक रूप से यह देखा गया है कि जब भी El Nino का प्रभाव बढ़ता है, तो भारत में तापमान काफी अधिक हो जाता है और मानसूनी बारिश में भारी कमी दर्ज की जाती है।

भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून पूरी तरह से जमीन और महासागर के बीच तापमान के अंतर पर निर्भर करता है। इस मौसमी घटना के दौरान, बिगड़ा हुआ वायुमंडलीय परिसंचरण उन मानसूनी हवाओं को कमजोर कर देता है जो अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से भारत में नमी (Moisture) लेकर आती हैं।

अगर ईसीएमडब्ल्यूएफ (ECMWF) का पूर्वानुमान सही साबित होता है और एक मजबूत ‘सुपर’ मौसमी घटना विकसित होती है, तो यह भारत के लिए विनाशकारी हो सकता है। इससे पूरे उत्तर और मध्य भारत में हीटवेव या लू के थपेड़ों की आशंका कई गुना बढ़ जाएगी। साथ ही, खरीफ की फसलों के लिए जरूरी मानसूनी बारिश में भारी कमी होने की भी चिंताएं गहरा गई हैं।

वैश्विक तापमान छुएगा अब तक का सबसे उच्चतम स्तर

यह शक्तिशाली मौसमी बदलाव केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के तापमान को रिकॉर्ड ऊंचाई पर धकेलने की क्षमता रखता है। प्रशांत महासागर के गर्म होने से निकलने वाली अतिरिक्त ऊर्जा ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के असर को और भी ज्यादा खतरनाक बना देती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि 1997-98 और 2015-16 में आए पिछले बड़े El Nino इवेंट्स ने दुनिया भर में चरम मौसम (Extreme Weather) को जन्म दिया था। उस दौरान कई देशों में भयंकर सूखा पड़ा था, तो कहीं विनाशकारी बाढ़ आई थी, जिसने वैश्विक तापमान के स्तर को भी अस्थायी रूप से बढ़ा दिया था।

नए पूर्वानुमान बताते हैं कि इस साल जून तक महासागर और वायुमंडल पूरी तरह से ‘कपल’ (Coupled) हो सकते हैं। इसका सीधा मतलब है कि गर्म होता प्रशांत महासागर और वायुमंडलीय पैटर्न एक-दूसरे को लगातार ताकत देंगे, जो इस घटना को अपने चरम स्तर (Super Level) पर ले जाने के लिए सबसे मुख्य आवश्यकता है।

दुनिया भर के तूफानों और चक्रवातों पर भी पड़ेगा असर

भारत को झुलसाने के अलावा, यह विकसित हो रहा जलवायु पैटर्न दुनिया भर के मौसम को फिर से आकार देने वाला है। जलवायु विज्ञानियों के अनुसार, अटलांटिक महासागर में ‘वर्टिकल विंड शीयर’ के मजबूत होने से वहां समुद्री तूफानों या हरिकेन की गतिविधियों में भारी कमी आ सकती है।

हालांकि, दूसरी ओर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में इसका उल्टा असर देखने को मिलेगा। वहां सामान्य से कहीं अधिक और बेहद खतरनाक टाइफून आने की आशंका जताई जा रही है।

यद्यपि इस मौसमी परिघटना की पूरी तीव्रता की सटीक भविष्यवाणी करना अभी भी थोड़ा जल्दबाजी है, लेकिन वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि इसके संकेत अब पूरी तरह से साफ हो चुके हैं। आने वाले कुछ ही महीनों में दुनिया भर के मौसम का मिजाज पूरी तरह से बदलने वाला है।

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