
पटना: Bihar, भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करने वाले आंदोलनों की जन्मस्थली, आज उसी समस्या के गहरे संकट में घिरा दिख रहा है जिसके ख़िलाफ़ एक समय उसने संघर्ष किया था—परिवारवाद। 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों के टिकट वितरण में ‘खून के रिश्ते’ जन-प्रतिनिधित्व की योग्यता पर भारी पड़ते दिख रहे हैं, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या Bihar ‘वंशवादी राजनीति’ को ही स्थिरता और भरोसे का पर्याय मान चुका है।
इतिहास की विडंबना: जेपी से तेजस्वी तक
1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने वंशवादी राजनीति को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताते हुए ‘संपूर्ण क्रांति’ का बिगुल फूंका था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि लोकतंत्र का अर्थ ‘जन भागीदारी’ है, न कि ‘सत्ता का पारिवारिक उत्तराधिकार’। हालाँकि, Bihar की राजनीति में यह आदर्श अस्थायी साबित हुआ।
1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव के उदय ने सामाजिक न्याय की नई लहर लाई, लेकिन यह लहर भी जल्द ही परिवार के दायरे में सिमट गई। उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं, और अब उनके पुत्र तेजस्वी यादव उस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। आज, Bihar की राजनीति का परिदृश्य बताता है कि वंशवाद केवल कांग्रेस की समस्या नहीं, बल्कि राज्य के लगभग सभी बड़े दलों की आंतरिक संरचना बन चुका है।
2025 का चुनावी परिदृश्य: ‘खून से ज़्यादा भरोसेमंद ब्रांड’
इंडिया टुडे की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के विधानसभा प्रत्याशियों की सूचियाँ ‘जनता की आकांक्षा से ज़्यादा पारिवारिक जमातों की सूची’ जैसी लग रही हैं। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), जनता दल (यूनाइटेड) (जेडीयू), भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) (लोजपा), और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) — सभी में बेटा, बहू, भतीजा, पत्नी और समधन तक उम्मीदवार के रूप में शामिल हैं।
- आरजेडी: तेजस्वी यादव पार्टी का मुख्य चेहरा हैं, लेकिन टिकट वितरण में ‘पारिवारिक पूंजी’ पर निर्भरता साफ़ दिखती है। शहाबुद्दीन के बेटे उसमा शहाब और मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला जैसे नाम इसी बात को पुख़्ता करते हैं कि पार्टी पुराने राजनीतिक नामों और उनसे जुड़े नेटवर्क को कैश कर रही है।
- एनडीए का हाल: जेडीयू भी इस मामले में पीछे नहीं है। नीतीश कुमार की पार्टी ने कई पुराने नेताओं के बेटे-बेटियों और पत्नियों को चुनावी मौक़ा दिया है। चिराग पासवान की लोजपा ने अपने परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता दी है, जबकि जीतन राम मांझी की ‘हम’ पार्टी ने अपनी बहू और दामाद दोनों को उम्मीदवार बनाया है।
आँकड़ों में वंशवाद: हर चौथा विधायक वंशवादी
इंडियन एक्सप्रेस की ताज़ा जाँच के अनुसार, वर्तमान (2020–2025) विधानसभा में तक़रीबन 28.81% विधायक वंशवादी हैं, जिसका मतलब है कि लगभग 70 विधायक किसी-न-किसी राजनीतिक परिवार से आते हैं।
| पार्टी | टिकट वितरण में परिवारों का अनुपात |
| आरजेडी | 42% |
| जेडीयू | 36% |
| बीजेपी | 21% |
यह आँकड़ा दर्शाता है कि Bihar में लगभग हर चौथा जनप्रतिनिधि राजनीति में अपने पारिवारिक नेटवर्क की बदौलत पहुंचा है, न कि पूरी तरह अपने जनाधार या योग्यता के आधार पर।
परिवारवाद क्यों है टिकाऊ?
परिवारवाद केवल स्वार्थ नहीं, बल्कि Bihar की जटिल सामाजिक संरचना में एक ‘व्यावहारिक चुनावी गणित’ भी बन चुका है। ग्रामीण Bihar में एक शक्तिशाली नाम किसी परिवार की पहचान बन जाता है, जो स्थानीय वोटरों को जोड़ने, जातीय समीकरण साधने और चुनाव के लिए संसाधन जुटाने में वर्षों के अनुभव वाले एक नए उम्मीदवार की तुलना में तुरंत मदद करता है। पारिवारिक उम्मीदवार के पास ‘नाम, नेटवर्क और पहचान’ का बना-बनाया ढाँचा होता है।
लोकतंत्र के लिए चुनौती और विरोधाभास
वंशवाद योग्य नेताओं की अनदेखी करता है और राजनीतिक नएपन को बाधित कर, लोकतंत्र को केवल ‘राज्य की संपत्ति’ की तरह परिवारों में बाँटने की परंपरा स्थापित करता है।
आज, Bihar एक विरोधाभास से गुज़र रहा है: शहरी मतदाता और युवा वर्ग सोशल मीडिया पर ‘नई राजनीति’ और योग्यता-आधारित नेतृत्व की बात कर रहा है, जबकि ग्रामीण Bihar अब भी जातीय समीकरण और ‘पारिवारिक पहचान’ को स्थिरता और भरोसे का प्रतीक मानकर प्राथमिक कारक के रूप में देखता है।
निष्कर्ष: क्या बदलाव की राह आसान है?
2025 का चुनाव केवल तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार के बीच सीटों का टकराव नहीं है, बल्कि ‘युवा बदलाव’ और ‘अनुभव एवं स्थिरता’ के विचारों का टकराव है। दुखद यह है कि दोनों ही धुरंधर परिवारवाद के घेरे से बाहर नहीं हैं।
प्रशांत किशोर के शब्दों को ध्यान में रखते हुए, “The politics of Bihar has shrunk into the hands of 1,250 families, while the state has 3 crore families।”
जब तक राजनीतिक दल आंतरिक लोकतंत्र को नहीं अपनाते, चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता नहीं लाते और युवा सहभागिता पर ज़ोर नहीं दिया जाता, तब तक परिवारवाद का यह चक्र टूटना मुश्किल है।
फिलहाल, यही कहा जा सकता है: Bihar परिवारवाद से नहीं, बल्कि परिवारवाद के साथ ही एक और महत्वपूर्ण चुनाव लड़ रहा है। सवाल यह है कि क्या Bihar का मतदाता इस बार ‘जाति और परिवार’ से ऊपर उठकर ‘योग्यता’ पर मुहर लगाएगा, जो राज्य के लोकतंत्र के लिए वास्तविक पुनर्जन्म होगा।
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