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क्या परिवारवाद की राजनीति से उबर पाया Bihar ?

क्या परिवारवाद की राजनीति से उबर पाया Bihar ?

Ravi Prakash Published on: 24 अक्टूबर 2025
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पटना: Bihar, भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करने वाले आंदोलनों की जन्मस्थली, आज उसी समस्या के गहरे संकट में घिरा दिख रहा है जिसके ख़िलाफ़ एक समय उसने संघर्ष किया था—परिवारवाद। 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों के टिकट वितरण में ‘खून के रिश्ते’ जन-प्रतिनिधित्व की योग्यता पर भारी पड़ते दिख रहे हैं, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या Bihar ‘वंशवादी राजनीति’ को ही स्थिरता और भरोसे का पर्याय मान चुका है।


इतिहास की विडंबना: जेपी से तेजस्वी तक

1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने वंशवादी राजनीति को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताते हुए ‘संपूर्ण क्रांति’ का बिगुल फूंका था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि लोकतंत्र का अर्थ ‘जन भागीदारी’ है, न कि ‘सत्ता का पारिवारिक उत्तराधिकार’। हालाँकि, Bihar की राजनीति में यह आदर्श अस्थायी साबित हुआ।

1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव के उदय ने सामाजिक न्याय की नई लहर लाई, लेकिन यह लहर भी जल्द ही परिवार के दायरे में सिमट गई। उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं, और अब उनके पुत्र तेजस्वी यादव उस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। आज, Bihar की राजनीति का परिदृश्य बताता है कि वंशवाद केवल कांग्रेस की समस्या नहीं, बल्कि राज्य के लगभग सभी बड़े दलों की आंतरिक संरचना बन चुका है।

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2025 का चुनावी परिदृश्य: ‘खून से ज़्यादा भरोसेमंद ब्रांड’

इंडिया टुडे की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के विधानसभा प्रत्याशियों की सूचियाँ ‘जनता की आकांक्षा से ज़्यादा पारिवारिक जमातों की सूची’ जैसी लग रही हैं। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), जनता दल (यूनाइटेड) (जेडीयू), भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) (लोजपा), और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) — सभी में बेटा, बहू, भतीजा, पत्नी और समधन तक उम्मीदवार के रूप में शामिल हैं।

  • आरजेडी: तेजस्वी यादव पार्टी का मुख्य चेहरा हैं, लेकिन टिकट वितरण में ‘पारिवारिक पूंजी’ पर निर्भरता साफ़ दिखती है। शहाबुद्दीन के बेटे उसमा शहाब और मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला जैसे नाम इसी बात को पुख़्ता करते हैं कि पार्टी पुराने राजनीतिक नामों और उनसे जुड़े नेटवर्क को कैश कर रही है।
  • एनडीए का हाल: जेडीयू भी इस मामले में पीछे नहीं है। नीतीश कुमार की पार्टी ने कई पुराने नेताओं के बेटे-बेटियों और पत्नियों को चुनावी मौक़ा दिया है। चिराग पासवान की लोजपा ने अपने परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता दी है, जबकि जीतन राम मांझी की ‘हम’ पार्टी ने अपनी बहू और दामाद दोनों को उम्मीदवार बनाया है।

आँकड़ों में वंशवाद: हर चौथा विधायक वंशवादी

इंडियन एक्सप्रेस की ताज़ा जाँच के अनुसार, वर्तमान (2020–2025) विधानसभा में तक़रीबन 28.81% विधायक वंशवादी हैं, जिसका मतलब है कि लगभग 70 विधायक किसी-न-किसी राजनीतिक परिवार से आते हैं।

पार्टीटिकट वितरण में परिवारों का अनुपात
आरजेडी42%
जेडीयू36%
बीजेपी21%

यह आँकड़ा दर्शाता है कि Bihar में लगभग हर चौथा जनप्रतिनिधि राजनीति में अपने पारिवारिक नेटवर्क की बदौलत पहुंचा है, न कि पूरी तरह अपने जनाधार या योग्यता के आधार पर।

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