नई दिल्ली, 22 अगस्त 2026: सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हो रहे जस्टिस संजय करोल की विदाई शनिवार को भावुक और आत्ममंथन से भरी रही। अपने अंतिम कार्यदिवस पर उन्होंने न्यायाधीशों की भूमिका और जिम्मेदारी को लेकर बेहद अहम बात कही। जस्टिस करोल ने कहा कि जज भगवान नहीं होते और हर फैसला सही नहीं हो सकता। लेकिन उनके मुताबिक न्यायाधीश के हाथ में एक ऐसी चीज जरूर होती है, जो न्याय की पूरी प्रक्रिया को मानवीय बना सकती है—अदालत में आए व्यक्ति को केवल याचिकाकर्ता नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में देखना।
विदाई भाषण में जस्टिस संजय करोल ने ऐसा क्यों कहा?
जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई संबोधन में न्यायिक प्रक्रिया की उस सीमा को स्वीकार किया, जिसके बारे में आमतौर पर सार्वजनिक रूप से कम चर्चा होती है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश भी इंसान हैं और उनसे हर फैसला पूरी तरह सही होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गलती की संभावना न्याय करने की जिम्मेदारी को कम नहीं करती। बल्कि यही कारण है कि न्यायाधीश के लिए विनम्रता और संवेदनशीलता बेहद जरूरी हो जाती है।
उन्होंने कहा कि संविधान न्यायाधीशों से केवल कानून को सही तरीके से लागू करने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि उसे न्यायपूर्ण तरीके से लागू करने की जिम्मेदारी भी देता है। उनके लिए न्याय का मतलब केवल यह तय करना नहीं था कि कानूनी तौर पर कौन सही है और कौन गलत। अदालत के सामने खड़े व्यक्ति की परिस्थितियों, उसकी उम्मीद और उसके पीछे की कहानी को समझना भी न्यायिक जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
याचिका के पीछे छिपे इंसान को देखने की बात क्यों कही?
जस्टिस करोल ने कहा कि अदालत में आने वाली याचिका किसी मामले के तथ्य और कानूनी दलीलें तो बता सकती है, लेकिन यह हमेशा नहीं बता सकती कि उस व्यक्ति ने पहले से क्या खोया है या वह अदालत से किस उम्मीद के साथ आया है। इसलिए न्यायाधीश को दस्तावेजों और दलीलों के आगे भी देखने की कोशिश करनी चाहिए। उनके मुताबिक, न्याय की प्रक्रिया में संवेदनशीलता और विनम्रता इसी वजह से जरूरी है।
उन्होंने कोर्टरूम में कही जाने वाली बातों के साथ उन बातों को समझने पर भी जोर दिया, जो सीधे शब्दों में सामने नहीं आतीं। जस्टिस करोल के अनुसार, अदालत की ‘खामोशियां’ भी बहुत कुछ कहती हैं और न्यायाधीशों को उन्हें समझना सीखना चाहिए। यह टिप्पणी उनके पूरे विदाई भाषण की उस सोच को सामने रखती है, जिसमें कानून के साथ मानवीय संवेदना को भी न्याय का हिस्सा माना गया।
जज की कुर्सी सिर्फ अधिकार नहीं, बड़ी जिम्मेदारी
अपने लंबे कानूनी सफर को याद करते हुए जस्टिस करोल ने सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम नंबर-1 से जुड़ा एक पुराना अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1996 में जब वह पहली बार इस कोर्टरूम में गए थे, तब उन्हें जजों की बेंच जमीन से करीब छह फीट ऊंची दिखाई देती थी। बाद में न्यायाधीश बनने पर उन्हें समझ आया कि उस ऊंचाई का अर्थ केवल अधिकार नहीं, बल्कि उससे जुड़ी बड़ी जिम्मेदारी भी है।
उन्होंने न्यायपालिका की असली ताकत आम नागरिक के भरोसे को बताया। उनके मुताबिक लोग अदालत में इस उम्मीद से आते हैं कि कोई उनकी बात सुनेगा और उन्हें न्याय मिलेगा। लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो न्याय की प्रक्रिया तक पहुंच नहीं पाते, क्योंकि उनके लिए अदालत बहुत दूर, महंगी या डरावनी हो सकती है। जस्टिस करोल ने न्याय व्यवस्था को ऐसे लोगों की स्थिति को भी ध्यान में रखने की जरूरत बताई।
करीब चार दशक का कानूनी सफर, अब आम नागरिक के रूप में वापसी
जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई भाषण में करीब चार दशक के कानूनी सफर को भी याद किया। उन्होंने वकील के तौर पर शुरुआत की और बाद में न्यायाधीश के रूप में लंबी जिम्मेदारी निभाई। वह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश और कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रहे। इसके बाद त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और फिर पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। 6 फरवरी 2023 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।
उनकी विदाई के मौके पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी उनके न्यायिक करियर और लोगों के प्रति संवेदनशील रवैये की सराहना की। सीजेआई ने जस्टिस करोल के धैर्य, विनम्रता, सुनने की इच्छा और कोर्टरूम में भरोसा पैदा करने वाले व्यवहार का उल्लेख किया। उन्होंने त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए लंबित मामलों को कम करने के उनके प्रशासनिक प्रयासों को भी याद किया।
जस्टिस संजय करोल की विदाई का सबसे बड़ा संदेश क्या रहा?
जस्टिस संजय करोल की विदाई का सबसे अहम संदेश यही रहा कि न्यायपालिका की ताकत केवल उसके संवैधानिक अधिकार में नहीं, बल्कि आम नागरिक के भरोसे में भी है। उनका यह कहना कि जज भगवान नहीं होते, न्यायिक व्यवस्था की कमजोरी बताने के बजाय उसके भीतर विनम्रता और आत्ममंथन की जरूरत पर जोर देता है। उनके अनुसार हर फैसला सही होने की गारंटी भले संभव न हो, लेकिन हर व्यक्ति को सुनने और उसके पीछे के इंसान को देखने की कोशिश न्यायाधीश के हाथ में जरूर है।
Disclaimer: यह खबर उपलब्ध सार्वजनिक बयानों और विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है। जस्टिस संजय करोल के विचारों को उनके विदाई संबोधन के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।
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