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LNMU बनाम कामेश्वर सिंह ट्रस्ट: क्या है वह जमीनी विवाद? कोर्ट ने क्यों दिया खाली करने का आदेश?

आखिर वो कौन सा पुराना कागज है जिसने आज हजारों छात्रों को सड़क पर ला खड़ा किया? राजा ने जो दान दिया, उसे अब वापस क्यों मांगा जा रहा है? 26 दिसंबर को क्या होने वाला है जो मिथिला के इतिहास को हमेशा के लिए बदल देगा? इस विवाद की...
Khabar Aangan Published on: 15 दिसम्बर 2025
LNMU बनाम कामेश्वर सिंह ट्रस्ट: क्या है वह जमीनी विवाद? कोर्ट ने क्यों दिया खाली करने का आदेश?
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मिथिलांचल की हृदयस्थली दरभंगा में इन दिनों शिक्षा और विरासत के बीच एक अजीबोगरीब जंग छिड़ी हुई है। ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी, जिसे आम बोलचाल में LNMU कहा जाता है, आज अपने सबसे बड़े अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।

बीते 7 दिसंबर को जब यूनिवर्सिटी कैंपस में पुलिस की गाड़ियां सायरन बजाते हुए दाखिल हुईं, तो किसी को यकीन नहीं हुआ कि यह वही जगह है जहां सरस्वती की वंदना होती है। मामला संगीत और नाट्य विभाग को खाली कराने का है, लेकिन इसके तार दशकों पुराने उस इतिहास से जुड़े हैं जब दरभंगा महाराज ने अपनी संपत्ति दान की थी।

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आज हर किसी की जुबान पर बस एक ही सवाल है—आखिर LNMU और कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के बीच का यह विवाद क्या है? क्यों राज परिवार का ट्रस्ट अपनी ही दी हुई जमीन वापस मांग रहा है?

और कोर्ट ने ऐसा क्या फैसला सुनाया है कि प्रशासन को बुलडोजर लेकर आना पड़ा? यह कहानी सिर्फ एक जमीन के टुकड़े की नहीं, बल्कि लीज, कानून और लापरवाही के उस कॉकटेल की है जिसने हजारों छात्रों के भविष्य को दांव पर लगा दिया है।

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आज की इस विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको इस विवाद की एक-एक परत खोलकर समझाएंगे। हम इतिहास के पन्नों से लेकर 7 दिसंबर की पुलिस कार्रवाई और 26 दिसंबर की डेडलाइन तक, सब कुछ विस्तार से बताएंगे ताकि आप समझ सकें कि आखिर गलती किसकी है।

राज दरभंगा और यूनिवर्सिटी का ऐतिहासिक रिश्ता

इस विवाद को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। दरभंगा राज भारत के सबसे अमीर और प्रभावशाली राजघरानों में से एक था। महाराज कामेश्वर सिंह शिक्षा प्रेमी थे और उन्होंने अपनी अकूत संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा जन कल्याण के लिए दान कर दिया था।

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1972 में जब LNMU की स्थापना हुई, तो यूनिवर्सिटी को चलाने के लिए राज परिवार ने अपने कई महल और जमीनें या तो दान कर दीं या फिर नाममात्र की लीज पर दे दीं।

यूनिवर्सिटी का प्रशासनिक भवन, कई विभाग और पुस्तकालय आज भी उन्हीं महलों में चलते हैं। संगीत एवं नाट्य विभाग जिस भवन में चलता है, वह भी इसी विरासत का हिस्सा है।

शुरुआत में सब कुछ ठीक चल रहा था। LNMU राज परिवार की दी हुई इमारतों में फल-फूल रही थी और शिक्षा का प्रसार हो रहा था। लेकिन समय के साथ लीज की शर्तों और मालिकाना हक को लेकर खटास आनी शुरू हो गई।

यही खटास आज एक बड़े कानूनी विवाद का रूप ले चुकी है। जिस उदारता के साथ राज परिवार ने जमीन दी थी, बाद के वर्षों में यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा उसकी देखभाल और कानूनी प्रक्रियाओं में बरती गई लापरवाही ने आज यह दिन दिखा दिया है।

विवाद की मुख्य जड़: कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास का दावा

वर्तमान विवाद के केंद्र में ‘कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास’ है, जो राज परिवार की संपत्तियों की देखरेख करने वाला एक ट्रस्ट है। ट्रस्ट का दावा है कि LNMU के संगीत और नाट्य विभाग के पास जो जमीन है, वह ट्रस्ट की संपत्ति है। ट्रस्ट के वकीलों के अनुसार, यूनिवर्सिटी को यह जमीन एक निश्चित अवधि के लिए लीज पर दी गई थी।

आरोप है कि LNMU प्रशासन ने लीज की अवधि खत्म होने के बाद न तो उसे रिन्यू कराया और न ही शर्तों का पालन किया। ट्रस्ट का कहना है कि जब लीज खत्म हो गई है, तो कानूनन जमीन पर उनका हक बनता है।

इसी आधार पर ट्रस्ट ने कई साल पहले कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। ट्रस्ट का तर्क है कि वे इस संपत्ति का उपयोग धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए करना चाहते हैं।

दूसरी तरफ, यूनिवर्सिटी प्रशासन का रवैया इस मामले में ढुलमुल रहा। जानकारों का कहना है कि LNMU के अधिकारियों ने इस केस को गंभीरता से नहीं लिया, जिसका खामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है।

कोर्ट का फैसला और प्रशासन की मजबूरी

यह मामला लंबे समय तक व्यवहार न्यायालय (Civil Court) में चला। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि जमीन पर ट्रस्ट का मालिकाना हक है और LNMU का कब्जा अब अवैध है। कोर्ट ने एक ‘डिक्री’ (अंतिम आदेश) जारी करते हुए प्रशासन को निर्देश दिया कि वह जमीन खाली करवाकर ट्रस्ट को सौंपे।

कोर्ट के इसी आदेश का पालन कराने के लिए जिला प्रशासन बाध्य है। जब कोर्ट डिक्री जारी करता है, तो पुलिस और मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी होती है कि वे कब्जा दिलवाएं। यही कारण है कि 7 दिसंबर को पुलिस बल कैंपस में पहुंचा था। प्रशासन के पास कोर्ट के आदेश को मानने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था, जब तक कि ऊपरी अदालत से कोई रोक (Stay) न लग जाए।

LNMU प्रशासन ने यहीं पर मात खा ली। कोर्ट का फैसला आने के बाद उन्हें तुरंत हाई कोर्ट जाना चाहिए था, लेकिन वे सही समय पर स्टे ऑर्डर लाने में विफल रहे। इस कानूनी चूक ने छात्रों को पुलिस के सामने खड़ा कर दिया।

7 दिसंबर का घटनाक्रम: जब कैंपस बना छावनी

रविवार, 7 दिसंबर को जब सदर एसडीओ और पुलिस टीम दलबल के साथ संगीत विभाग पहुंची, तो वहां का माहौल तनावपूर्ण हो गया। उस समय विभाग में सेमेस्टर की परीक्षाएं चल रही थीं। पुलिस को देखते ही LNMU के छात्र आक्रोशित हो गए। उन्होंने कक्षाओं से बाहर निकलकर मानव श्रृंखला बना ली और विभाग के मुख्य गेट को घेर लिया।

छात्रों का तर्क था कि यह कोई व्यावसायिक इमारत नहीं है जिसे कभी भी खाली करा लिया जाए। यह सरस्वती का मंदिर है जहां हजारों छात्रों का भविष्य बनता है। बीच सत्र में, जब परीक्षाएं चल रही हों, तब विभाग को सील करना अमानवीय है। छात्रों ने “शिक्षा बचाओ” के नारे लगाए और साफ कर दिया कि वे अपनी जगह से नहीं हिलेंगे। पुलिस और छात्रों के बीच घंटों तक गतिरोध बना रहा।

इस दौरान यूनिवर्सिटी की रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारी भी मौके पर पहुंचे। उन्होंने जिला प्रशासन को समझाने की कोशिश की कि अगर बल प्रयोग किया गया, तो कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है और LNMU की छवि खराब होगी।

26 दिसंबर की डेडलाइन का सच

छात्रों के उग्र प्रदर्शन और चल रही परीक्षाओं को देखते हुए जिला प्रशासन ने फिलहाल कार्रवाई टाल दी है। लेकिन यह राहत बहुत छोटी है। प्रशासन ने LNMU को विभाग खाली करने के लिए 26 दिसंबर 2025 तक का अल्टीमेटम दिया है। यह तारीख इसलिए तय की गई है क्योंकि तब तक परीक्षाएं समाप्त हो जाएंगी।

यह 26 दिसंबर की तारीख अब यूनिवर्सिटी के लिए ‘डू ऑर डाई’ (करो या मरो) वाली स्थिति बन गई है। इसका सीधा मतलब है कि परीक्षाओं के बाद प्रशासन फिर से पूरी तैयारी के साथ आएगा। अगर तब तक LNMU ने कोई कानूनी समाधान नहीं निकाला, तो विभाग पर ताला लगना तय है।

छात्रों में इस तारीख को लेकर भारी डर है। उन्हें चिंता है कि जब वे क्रिसमस की छुट्टियों के बाद वापस आएंगे, तो क्या उनकी क्लासरूम बची रहेगी? या फिर उन्हें खुले आसमान के नीचे पढ़ना होगा?

क्या है आगे का रास्ता?

इस संकट से निकलने के लिए LNMU के पास अब बहुत सीमित विकल्प बचे हैं। सबसे पहला और तत्काल रास्ता है पटना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना। यूनिवर्सिटी को एक मजबूत लीगल टीम के साथ हाई कोर्ट में अपील करनी होगी और निचली अदालत के आदेश पर ‘स्टे’ मांगना होगा।

दूसरा विकल्प है राज्य सरकार का हस्तक्षेप। चूंकि यह एक सरकारी विश्वविद्यालय का मामला है, इसलिए सरकार चाहे तो इस जमीन का अधिग्रहण (Acquisition) कर सकती है या ट्रस्ट के साथ कोई समझौता कर सकती है। इसके लिए LNMU प्रशासन ने शिक्षा विभाग और राजभवन को पत्र भी लिखा है।

तीसरा रास्ता है ट्रस्ट के साथ बातचीत। प्रशासन ट्रस्ट के अधिकारियों के साथ बैठकर नए सिरे से लीज डीड साइन करने या बकाया भुगतान करने का प्रस्ताव दे सकता है। लेकिन ट्रस्ट का रुख फिलहाल सख्त नजर आ रहा है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, LNMU और कामेश्वर सिंह ट्रस्ट का यह विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर है। यह लड़ाई अब सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि हजारों छात्रों के सपनों और एक ऐतिहासिक विरासत को बचाने की है।

26 दिसंबर की तारीख नजदीक आ रही है। देखना होगा कि कानून जीतता है या शिक्षा। क्या प्रशासन अपनी गलती सुधार पाएगा या फिर मिथिला के सुर हमेशा के लिए खामोश हो जाएंगे?

Related Disclaimer : यह लेख न्यायालय के सार्वजनिक आदेशों, ऐतिहासिक तथ्यों और 7 दिसंबर 2025 को हुए घटनाक्रम पर आधारित है। भूमि विवाद का मामला न्यायालय के विचाराधीन है। हम किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करते और पाठकों को आधिकारिक अदालती फैसलों का सम्मान करने की सलाह देते हैं।

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