
Karnataka Politicsमें पिछले कई महीनों से चल रही अंदरूनी खींचतान, आखिरकार आज एक निर्णायक मोड़ पर पहुंची। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच आज सुबह हुई एक ‘breakfast meeting’ (नाश्ते पर मुलाकात) ने कांग्रेस आलाकमान के सख्त हस्तक्षेप के बाद चल रहे सियासी कलह पर अस्थायी रूप से ‘ब्रेक’ लगा दिया है।
हालाँकि, दोनों नेताओं ने मुलाकात के बाद साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और एकता का प्रदर्शन किया, लेकिन सवाल अभी भी बना हुआ है: क्या यह ‘ब्रेकफास्ट डिप्लोमेसी’ (Breakfast Diplomacy) केवल ऑप्टिकल इल्यूजन है, या वास्तव में कर्नाटक कांग्रेस कलह का स्थायी समाधान निकल चुका है?
आलाकमान का सख्त निर्देश: नाश्ता सिर्फ नाश्ता नहीं, सुलह का संदेश
पिछले कुछ हफ्तों से, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर मुख्यमंत्री पद को लेकर की जा रही बयानबाजी ने कांग्रेस हाईकमान को चिंतित कर दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने हस्तक्षेप करते हुए दोनों नेताओं को तुरंत मिलकर मतभेदों को सुलझाने का निर्देश दिया।
सीएम सिद्धारमैया ने स्वयं मीडिया को बताया कि यह बैठक आलाकमान के निर्देश पर बुलाई गई थी। आज सुबह उपमुख्यमंत्री शिवकुमार, मुख्यमंत्री के कावेरी आवास पर पहुंचे, जहाँ उन्होंने इडली-सांभर पर अनौपचारिक बातचीत की।
मुलाकात के बाद नेताओं के बयान: एकता का दावा
‘breakfast meeting’ के बाद, दोनों नेताओं ने मीडिया के सामने आकर एकजुटता का संदेश दिया।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा”हमारे बीच कोई मतभेद नहीं है और भविष्य में भी कोई मतभेद नहीं रहेगा। हम दोनों पार्टी हाईकमान के फैसले का सम्मान करेंगे।” उन्होंने मीडिया पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह बैठक आलाकमान के कहने पर हुई है और ‘कल से कोई भ्रम नहीं रहेगा।’
उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा“हम पार्टी के वफादार सिपाही हैं। जहाँ तक नेतृत्व का सवाल है, यह पार्टी आलाकमान को तय करना है। वे जो भी कहेंगे, हम उसका पालन करेंगे। हम साथ मिलकर काम कर रहे हैं।”
दोनों नेताओं के इन बयानों का सार यह है कि उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पार्टी आलाकमान के निर्णय के अधीन रखा है।
मतभेद की जड़ें: 2.5 साल का ‘सीक्रेट डील’ विवाद
कर्नाटक की सियासी कलह की असली जड़ें मई 2023 में सरकार गठन के समय हुए कथित सत्ता साझाकरण फॉर्मूला (Power Sharing Formula) में हैं।
कथित रोटेशन डील: डीके शिवकुमार के समर्थकों का दावा है कि आलाकमान ने 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें 2.5 साल बाद मुख्यमंत्री बनाने का गुप्त समझौता किया था। शिवकुमार ने पिछले दिनों सोशल मीडिया पर “अपनी बात का मान रखकर आगे बढ़ना चाहिए” और “शब्द शक्ति ही विश्व शक्ति है” जैसे कोडवर्ड वाले बयान दिए, जिसे इसी समझौते की याद दिलाने के रूप में देखा गया।
सिद्धारमैया का रुख: मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनके खेमे ने इस ‘2.5 साल के फॉर्मूले’ को हमेशा बेबुनियाद बताया है। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सरकार को पूरे पाँच साल का जनादेश मिला है और आलाकमान जो भी फैसला लेगा, उन्हें स्वीकार होगा।
जातिगत समीकरणों का दबाव
यह विवाद केवल दो नेताओं की महत्वाकांक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जातिगत समीकरणों और सामाजिक गठबंधनों के दबाव का भी परिणाम है:
सिद्धारमैया (कुरुबा): उन्हें AHINDA (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) वोटों का मजबूत समर्थन प्राप्त है। इन समुदायों के नेताओं ने आलाकमान को स्पष्ट चेतावनी दी है कि सिद्धारमैया को हटाना कांग्रेस के लिए चुनावी रूप से भारी पड़ सकता है।
डीके शिवकुमार (वोक्कालिगा): शिवकुमार संगठनात्मक शक्ति और फंड जुटाने की क्षमता रखते हैं। वह वोक्कालिगा समुदाय का बड़ा चेहरा हैं, और जेडीएस के कमजोर होने के बाद इस समुदाय को साधने के लिए वह कांग्रेस के लिए अपरिहार्य हैं।
कांग्रेस एक ऐसे नाजुक गठजोड़ पर खड़ी है जहाँ सिद्धारमैया को हटाना AHINDA को नाराज़ कर सकता है, और शिवकुमार को लगातार दरकिनार करना वोक्कालिगा वोटों और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर कर सकता है।






