पटना/रांची/वाराणसी (विशेष संवाददाता): भारतीय संस्कृति के सबसे पवित्र और कठिन त्योहारों में से एक, Chhath Puja (सूर्य षष्ठी व्रत) का चार दिवसीय महापर्व आज ‘नहाय-खाय’ के अनुष्ठान के साथ शुरू हो गया है । यह पर्व सूर्य देव (सूर्य) और उनकी बहन, छठी मैया को समर्पित है, जो जीवन, ऊर्जा और संतान के दीर्घायु होने का आशीर्वाद देते हैं ।
बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों से शुरू हुआ यह महाव्रत अब वैश्विक हो चुका है, जहाँ श्रद्धालु 36 घंटे के निर्जला (पानी रहित) उपवास के साथ प्रकृति के सबसे बड़े देवता सूर्य की उपासना करते हैं । इस वर्ष, यह Chhath त्योहार एक बार फिर सामूहिक शुद्धता, सामाजिक समानता और अटूट आस्था के संदेश के साथ आया है।
यह विशेष न्यूज़ आर्टिकल Chhath Puja के चार दिनों की विस्तृत विधि, इसके प्राचीन इतिहास और स्वास्थ्य तथा पर्यावरण से जुड़े वैज्ञानिक महत्व का विश्लेषण करता है।
Chhath Puja का प्रत्येक दिन एक विशेष अनुष्ठान और आध्यात्मिक शुद्धिकरण की प्रक्रिया को दर्शाता है। व्रती (parvaitin) इस दौरान अत्यधिक संयम, स्वच्छता और भक्ति का पालन करते हैं ।
1. प्रथम दिन: नहाय-खाय (शारीरिक और मानसिक शुद्धि)
प्रारंभ:Chhath Puja के पहले दिन को नहाय-खाय कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “स्नान और भोजन” । इस दिन व्रती प्रातः काल उठकर किसी पवित्र नदी, तालाब या घर में ही गंगाजल मिले जल से स्नान करते हैं । यह स्नान केवल शारीरिक नहीं, बल्कि Chhath Vrat के लिए मानसिक शुद्धता की शुरुआत माना जाता है ।
व्रत का भोजन: स्नान के बाद, व्रती सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इस भोजन को बनाने में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसमें आमतौर पर अरवा चावल, चना दाल, और कद्दू (लौकी) की सब्जी शामिल होती है, जिसे बिना लहसुन और प्याज के शुद्ध घी में पकाया जाता है । व्रती के भोजन के बाद ही घर के अन्य सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन घर और पूजा के स्थान की पूरी तरह से साफ-सफाई भी की जाती है ।
2. दूसरा दिन: खरना (36 घंटे के महाव्रत की तैयारी)
दूसरे दिन को खरना कहा जाता है, जो Chhath Vrat की कठोरता की शुरुआत करता है।
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विधि और प्रसाद: खरना के दिन व्रती पूरे दिन का उपवास रखते हैं। यह उपवास सूर्य अस्त होने के बाद तोड़ा जाता है । शाम को, व्रती पृथ्वी माता की पूजा करते हैं और विशेष ‘खरना प्रसाद’ तैयार किया जाता है। यह प्रसाद शुद्धता के साथ बनाया जाता है, जिसमें गुड़ की खीर (चावल की खीर) और शुद्ध आटे की रोटी या पूड़ी प्रमुख होती है ।
संकल्प: व्रती इसी खरना प्रसाद को ग्रहण करके अपना प्रारंभिक उपवास तोड़ते हैं। इस प्रसाद को ग्रहण करने के तुरंत बाद ही 36 घंटे का अत्यंत कठिन ‘निर्जला व्रत’ (बिना पानी और भोजन के) शुरू हो जाता है, जो अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही समाप्त होता है ।
3. तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य की उपासना)
यह दिन Chhath Puja का मुख्य अनुष्ठानिक केंद्र है।
निर्जला संकल्प: व्रती 36 घंटे के निर्जला व्रत को जारी रखते हैं। दोपहर के बाद, घरों में प्रसाद की तैयारी पूरी होती है। व्रती और उनके परिवारजन बाँस की टोकरियों (सूप या दउरा) में ठेकुआ, गन्ना, नारियल, और मौसमी फल जैसे प्रसाद सजाकर बड़े जुलूस के साथ नदी, तालाब या जलाशय के किनारे (घाट) की ओर प्रस्थान करते हैं ।
अर्घ्य दान: जैसे ही सूर्य क्षितिज पर नीचे उतरता है, व्रती जल में कमर या घुटने तक खड़े हो जाते हैं । इस दौरान, वे सूर्य देव को जल (अर्घ्य) अर्पित करते हैं, उनसे परिवार की समृद्धि, कल्याण और जीवन की ऊर्जा के लिए प्रार्थना करते हैं । जल में खड़े होकर पूजा करना न केवल आध्यात्मिक शुद्धिकरण है, बल्कि मानसिक दृढ़ता का भी प्रतीक है । जल में तैरते हुए मिट्टी के दीये (दीया) भक्ति का एक अलौकिक दृश्य प्रस्तुत करते हैं ।
कोसी अनुष्ठान: बिहार और पूर्वी क्षेत्रों में, रात में ‘कोसी’ नामक एक सुंदर अनुष्ठान होता है। इसमें गन्ने की डंडियों से एक अस्थायी मंडप बनाया जाता है और उसके भीतर मिट्टी के दीये जलाकर प्रसाद रखा जाता है। यह अनुष्ठान छठी मैया की सुरक्षा का प्रतीक है ।
4. चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण (व्रत का समापन)
अंतिम दिन, व्रती सूर्योदय से पहले ही घाट पर पहुँच जाते हैं।
उगते सूर्य को अर्घ्य: सभी व्रती और परिवारजन, तीसरे दिन की तरह, पानी में खड़े होकर, उगते हुए सूर्य को अंतिम अर्घ्य अर्पित करते हैं । उगते सूर्य की पूजा नवीनता, आशा और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है ।
खोइँच और पारण: अंतिम अर्घ्य के बाद, खोइँच की महत्वपूर्ण रस्म होती है । इसमें घर की बुजुर्ग परवैतिन (महिलाएँ) प्रसाद से भरा एक मिट्टी का बर्तन या सूप अपनी जूनियर महिलाओं को आशीर्वाद के रूप में सौंपती हैं, जो स्वास्थ्य, प्रजनन क्षमता और वैवाहिक सुख की कामना करता है । इस रस्म के बाद, व्रती प्रसाद और जल ग्रहण करके अपना 36 घंटे का कठोर निर्जला व्रत तोड़ते हैं (पारण), और प्रसाद को सामूहिक रूप से बाँटा जाता है, जो सामुदायिक एकता को मजबूत करता है ।
II. Chhath की प्राचीनता: वैदिक मंत्रों से महाकाव्यों की गाथाएँ
Chhath Puja का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है और इसकी जड़ें भारत के धार्मिक और पौराणिक साहित्य में गहराई तक समाई हुई हैं ।
2.1. ऋग्वेद और ठेकुआ का उद्गम
इस सौर महोत्सव की उत्पत्ति का संबंध प्रारंभिक वैदिक काल से है। ऋग्वेद जैसे प्राचीनतम ग्रंथों में सूर्य की महिमा का गुणगान करने वाले सूर्य सूक्त (ह्यम्स) भरे पड़े हैं ।
ठेकुआ का इतिहास:Chhath Puja का मुख्य प्रसाद, ठेकुआ, इसकी प्राचीनता का प्रमाण है । इसे लगभग 3,700 वर्ष पुराना माना जाता है और ऋग्वेद में इसे ‘अपूपा’ नाम से वर्णित किया गया है । ठेकुआ, जो गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से बनाया जाता है , इसकी सरलता, टिकाऊपन और पोषण मूल्य के कारण, यह आज भी प्रसाद का केंद्रीय हिस्सा है ।
2.2. महाभारत और राम-सीता का संकल्प
Chhath का उल्लेख भारत के दो महान महाकाव्यों—महाभारत और रामायण—में मिलता है ।
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महाभारत में द्रौपदी: महाकाव्य महाभारत में उल्लेख है कि अपने वनवास के दौरान, द्रौपदी और पांडवों ने महर्षि धौम्य की सलाह पर Chhath अनुष्ठान किए थे । द्रौपदी के इस कठोर व्रत के परिणामस्वरूप पांडवों को विपत्तियों से उबरने और खोया हुआ राज्य वापस पाने में सहायता मिली, जिससे यह पर्व संकटों से मुक्ति का प्रतीक बन गया ।
सूर्यपुत्र कर्ण: सूर्य देव के पुत्र, महान धनुर्धर कर्ण, सूर्य के सबसे बड़े भक्त थे । Chhath Puja के सिद्धांत अक्सर कर्ण के सूर्य के प्रति अटूट समर्पण और उनसे प्राप्त शक्ति की गाथाओं से जुड़े होते हैं ।
रामायण में सीता:रामायण के अनुसार, रावण पर विजय प्राप्त करने और अयोध्या लौटने के बाद, भगवान राम और माता सीता ने कृतज्ञता व्यक्त करने और शांति के लिए सूर्य देव और छठी मैया को अर्घ्य दिया था । बिहार के मुंगेर क्षेत्र में सीताचरण मंदिर स्थित है, जिसके बारे में यह लोक-मान्यता है कि यहीं पर सीता माता ने Chhath व्रत किया था ।
2.3. छठी मैया का मातृत्व आशीर्वाद
छठी मैया की पूजा की उत्पत्ति ब्रह्म वैवर्त पुराण की कथा से जुड़ी है। इसमें राजा प्रियव्रत का उल्लेख है, जो संतानहीन होने के कारण दुखी थे। उनकी पत्नी मालिनी ने जब मृत शिशु को जन्म दिया, तब राजा ने जीवन त्यागने का निर्णय लिया। उसी समय, भगवान ब्रह्मा की पुत्री, देवसेना (जो अब छठी मैया के रूप में पूजी जाती हैं), प्रकट हुईं । उनके स्पर्श से शिशु जीवित हो उठा और राजा ने पृथ्वी पर उनकी पूजा स्थापित करने का संकल्प लिया । इसीलिए छठी मैया को बच्चों की रक्षक और प्रजनन क्षमता की देवी माना जाता है ।
III. विज्ञान और समाज: स्वास्थ्य, डिटॉक्सिफिकेशन और समानता
Chhath Puja के अनुष्ठान केवल धार्मिक नहीं हैं, बल्कि ये स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी और सामाजिक सद्भाव के सिद्धांतों पर आधारित हैं ।
3.1. स्वास्थ्य विज्ञान: उपवास और सूर्य चिकित्सा
Chhath Vrat को एक प्राचीन मनोदैहिक हस्तक्षेप (Psychosomatic Intervention) माना जाता है, जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करता है ।
डिटॉक्सिफिकेशन (Autophagy): 36 घंटे का निर्जला व्रत पाचन तंत्र को विश्राम देकर मेटाबॉलिक दर को बढ़ाता है । यह लंबी अवधि का उपवास कोशिकाओं में ऑटोफैगी (Autophagy) नामक प्रक्रिया को सक्रिय करता है, जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को साफ कर प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती है ।
विटामिन डी और मन की शांति: सुबह और शाम के समय पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर को विटामिन डी के संश्लेषण के लिए सबसे सुरक्षित और प्रभावी समय मिलता है । यह विटामिन प्रतिरक्षा और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही, सुबह की धूप सेरोटोनिन (Serotonin, हैप्पी हार्मोन) को बढ़ाती है, जिससे मन शांत और एकाग्र रहता है ।
हाइड्रोथेरेपी: जल में खड़े होने की प्रथा आधुनिक हाइड्रोथेरेपी के समान है। पानी में रहने से रक्त संचार में सुधार होता है और शरीर का बायोइलेक्ट्रिकल फील्ड स्थिर होता है, जिससे प्राण (जीवन ऊर्जा) का प्रवाह बेहतर होता है ।
3.2. सामाजिक समानता और पर्यावरण संरक्षण
Chhath Puja को एक सामाजिक एकता का त्योहार माना जाता है। इस दौरान, जाति, वर्ग या लिंग के भेद समाप्त हो जाते हैं । व्रती स्वयं अपनी आस्था और समर्पण के बल पर आध्यात्मिक योग्यता अर्जित करते हैं । यह पर्व धार्मिक सद्भाव को भी बढ़ावा देता है; कई क्षेत्रों में, मुस्लिम समुदाय के सदस्यों के भी ऐतिहासिक रूप से इस उत्सव में भाग लेने के प्रमाण मिलते हैं ।
पारिस्थितिक चेतना:Chhath Puja की सबसे बड़ी विशिष्टता इसका पर्यावरण-प्रेम है । पूजा में उपयोग किए जाने वाले सभी सामान (गन्ना, फल, मिट्टी के दीये) जैव-अपघटनीय (biodegradable) होते हैं । यह परंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान और जल निकायों (नदियों, तालाबों) की सफाई और संरक्षण की आवश्यकता पर ज़ोर देती है ।
आधुनिक चुनौतियाँ और समाधान: पर्यावरण विशेषज्ञ बताते हैं कि अनुष्ठान के बाद प्रसाद सामग्री का जमाव कभी-कभी जल प्रदूषण का कारण बन सकता है । इसके समाधान के लिए, एनजीओ और स्वयंसेवी समूह अब सामुदायिक सफाई अभियान चला रहे हैं, जिसमें नदी तटों पर अपशिष्ट को अलग करने (segregation) के लिए स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं । स्थानीय स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों को शामिल करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, ताकि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी में भी बनी रहे ।
3.3. वैश्विक घाट: विदेशों में आस्था का फैलाव
प्रवासी भारतीयों की अटूट आस्था के कारण Chhath Puja अब संयुक्त राज्य अमेरिका (न्यूयॉर्क, शिकागो), ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में भी धूमधाम से मनाई जाती है ।
विदेशों में, जहाँ पवित्र नदियों तक पहुँचना संभव नहीं होता, वहाँ श्रद्धालु इनफ्लेटेबल पूल या साफ किए गए सार्वजनिक झीलों का उपयोग करके अर्घ्य देते हैं । यह अनुकूलन दिखाता है कि Chhath Puja की भावना भौगोलिक सीमाओं से ऊपर है, और यह विदेशों में रहने वाले समुदायों के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है ।
IV. निष्कर्ष: आस्था और अडिग संकल्प का प्रकाश
नहाय-खाय से शुरू होकर, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य तक चलने वाला Chhath का यह महापर्व, केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह प्राचीन भारत की उस सभ्यता का प्रतीक है जिसने प्रकृति और विज्ञान के नियमों को भक्ति के साथ आत्मसात किया। 36 घंटे का निर्जला Chhath Vrat, सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने का प्रयास, और जल में खड़े होकर साधना करना, मनुष्य को उसके आंतरिक संकल्प, शारीरिक क्षमता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ तालमेल बिठाने की सीख देता है । Chhath Puja का यह प्रकाश आस्था, स्वास्थ्य और सामाजिक समरसता की निरंतरता का प्रतीक है।
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