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नहाय-खाय से महासंकल्प तक: शुरू हुआ 36 घंटे का महापर्व Chhath, जानें चार दिन के अनुष्ठान, इतिहास और स्वास्थ्य लाभ

Chhath महापर्व शुरू! नहाय-खाय से खरना तक 36 घंटे के निर्जला व्रत का अनुष्ठान, पौराणिक इतिहास (द्रौपदी, सीता) और स्वास्थ्य विज्ञान से जुड़े लाभ जानें।
Khabar Aangan Published on: 25 अक्टूबर 2025
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पटना/रांची/वाराणसी (विशेष संवाददाता): भारतीय संस्कृति के सबसे पवित्र और कठिन त्योहारों में से एक, Chhath Puja (सूर्य षष्ठी व्रत) का चार दिवसीय महापर्व आज ‘नहाय-खाय’ के अनुष्ठान के साथ शुरू हो गया है । यह पर्व सूर्य देव (सूर्य) और उनकी बहन, छठी मैया को समर्पित है, जो जीवन, ऊर्जा और संतान के दीर्घायु होने का आशीर्वाद देते हैं ।   

बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों से शुरू हुआ यह महाव्रत अब वैश्विक हो चुका है, जहाँ श्रद्धालु 36 घंटे के निर्जला (पानी रहित) उपवास के साथ प्रकृति के सबसे बड़े देवता सूर्य की उपासना करते हैं । इस वर्ष, यह Chhath त्योहार एक बार फिर सामूहिक शुद्धता, सामाजिक समानता और अटूट आस्था के संदेश के साथ आया है।   

यह विशेष न्यूज़ आर्टिकल Chhath Puja के चार दिनों की विस्तृत विधि, इसके प्राचीन इतिहास और स्वास्थ्य तथा पर्यावरण से जुड़े वैज्ञानिक महत्व का विश्लेषण करता है।

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I. चार दिवसीय अनुष्ठान: शुद्धता से संकल्प की ओर

Chhath Puja का प्रत्येक दिन एक विशेष अनुष्ठान और आध्यात्मिक शुद्धिकरण की प्रक्रिया को दर्शाता है। व्रती (parvaitin) इस दौरान अत्यधिक संयम, स्वच्छता और भक्ति का पालन करते हैं ।   

1. प्रथम दिन: नहाय-खाय (शारीरिक और मानसिक शुद्धि)

प्रारंभ: Chhath Puja के पहले दिन को नहाय-खाय कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “स्नान और भोजन” । इस दिन व्रती प्रातः काल उठकर किसी पवित्र नदी, तालाब या घर में ही गंगाजल मिले जल से स्नान करते हैं । यह स्नान केवल शारीरिक नहीं, बल्कि Chhath Vrat के लिए मानसिक शुद्धता की शुरुआत माना जाता है ।   

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