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नेपाल में 4000 फीट नीचे गिरा आधा किलोमीटर का ग्लेशियर, फिर आई 100 फीट ऊंची बाढ़ की लहर; तबाही की पूरी कहानी

नेपाल-तिब्बत सीमा पर अचानक आई बाढ़ के पीछे लैंगटांग लिरुंग ग्लेशियर से जुड़ा विशाल हिमस्खलन बताया जा रहा है। आधा किलोमीटर से बड़ा बर्फ का हिस्सा हजारों फीट नीचे गिरा और फिर मलबे की लहर ने भारी तबाही मचा दी।
Ashutosh Kumar Jha Published on: 27 अगस्त 2026
नेपाल में 4000 फीट नीचे गिरा आधा किलोमीटर का ग्लेशियर, फिर आई 100 फीट ऊंची बाढ़ की लहर; तबाही की पूरी कहानी
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काठमांडू, 27 अगस्त 2026: नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई भीषण बाढ़ के पीछे अब एक भयावह प्राकृतिक घटनाक्रम की तस्वीर सामने आ रही है। उपलब्ध सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, लैंगटांग लिरुंग ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटकर नीचे गिरने से बर्फ, चट्टान और मलबे का विशाल प्रवाह बना। इसके बाद नदी का रास्ता बाधित हुआ और अचानक पानी-मलबे की तेज लहर ने नेपाल के कई इलाकों में भारी तबाही मचा दी। इस आपदा में 160 से अधिक लोगों की मौत की खबर है और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं।

2000 फीट चौड़ा बर्फ का हिस्सा 4000 फीट नीचे गिरा

सैटेलाइट इमेजरी के विश्लेषण में सामने आया है कि करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियर का लगभग 2000 फीट चौड़ा हिस्सा टूटकर करीब 4000 फीट नीचे घाटी की ओर गिरा। यह आकार आधा किलोमीटर से भी अधिक है। इतनी ऊंचाई से बर्फ और चट्टानों के गिरने से पैदा हुई ऊर्जा ने नीचे मौजूद बर्फ, मलबे और पानी को भी अपने साथ बहा लिया। विशेषज्ञों के मुताबिक यही घटनाक्रम आगे चलकर विनाशकारी फ्लैश फ्लड में बदल गया।

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इस घटना का असर सिर्फ ग्लेशियर के आसपास तक सीमित नहीं रहा। बर्फ और चट्टानों का भारी मलबा नदी के रास्ते में पहुंचा और पानी के प्रवाह को रोकने लगा। कुछ समय के लिए पानी जमा हुआ और इसके बाद जब यह अवरोध टूटा तो तेज रफ्तार में पानी, मिट्टी और बड़े पत्थरों का प्रवाह नीचे की ओर दौड़ पड़ा। हिमालय की संकरी और खड़ी घाटियों ने इस प्रवाह को और खतरनाक बना दिया।

लैंगटांग लिरुंग से शुरू हुई तबाही कैसे फैली?

विशेषज्ञों का मानना है कि लैंगटांग लिरुंग ग्लेशियर के उत्तरी हिस्से में यह घटना हुई। 7,234 मीटर यानी करीब 23,733 फीट ऊंचा लैंगटांग लिरुंग पर्वत काठमांडू से लगभग 45 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। बर्फ और चट्टानों के गिरने के बाद मलबा ल्हेन्दे खोला नदी के रास्ते में पहुंचा। नदी के अवरुद्ध होने और फिर अचानक खुलने से पानी और मलबे की लहर त्रिशूली नदी की ओर बढ़ गई।

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रिपोर्ट के अनुसार यह प्रवाह कुछ जगहों पर करीब 100 फीट ऊंची सुनामी जैसी मलबे की लहर में बदल गया। इसकी रफ्तार इतनी अधिक थी कि लोगों को संभलने या सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का पर्याप्त समय नहीं मिला। प्रभावित इलाकों में गांवों, सड़कों, पुलों और बिजली से जुड़े बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है।

क्या भूकंप से शुरू हुई थी यह आपदा?

आपदा के शुरुआती घंटों में भूकंप को संभावित कारण माना गया था। चीन की सीमा के पास सुबह करीब 8:37 बजे 4.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था। हालांकि वैज्ञानिक अभी इस सवाल पर पूरी तरह एकमत नहीं हैं कि भूकंप ने ग्लेशियर और ढलान को अस्थिर किया या फिर विशाल हिमस्खलन और बर्फ-चट्टान के गिरने से ही भूकंपीय कंपन पैदा हुआ। इसलिए घटना की सटीक ट्रिगरिंग को लेकर जांच जारी है।

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लैंगटांग लिरुंग पहले भी बन चुका है बड़ी त्रासदी का केंद्र

लैंगटांग लिरुंग ग्लेशियर और आसपास का इलाका पहले भी बड़े हिमस्खलन की चपेट में आ चुका है। वर्ष 2015 के विनाशकारी नेपाल भूकंप के दौरान इसी पर्वतीय क्षेत्र के दक्षिणी हिस्से में बड़ा हिमस्खलन हुआ था। उसके मलबे ने लैंगटांग गांव को प्रभावित किया था और कम से कम 300 लोगों की मौत हुई थी। मौजूदा घटना उसी पर्वत के उत्तरी हिस्से से जुड़ी बताई जा रही है।

विशेषज्ञ इस घटना को हिमालय में बढ़ते ग्लेशियर और पर्वतीय आपदा जोखिम से भी जोड़कर देख रहे हैं। ग्लेशियरों का पीछे हटना, पर्माफ्रॉस्ट का कमजोर होना और मोरेन में पानी का बढ़ना पहाड़ी ढलानों को अस्थिर कर सकता है। हालांकि किसी एक आपदा का कारण केवल जलवायु परिवर्तन को मानना उचित नहीं होगा, लेकिन बदलती हिमालयी परिस्थितियां ऐसे खतरों को गंभीर बना रही हैं।

160 से ज्यादा मौतें, कई इलाके और परियोजनाएं प्रभावित

गुरुवार सुबह तक नेपाल और तिब्बत क्षेत्र में 160 से अधिक मौतों की खबर सामने आ चुकी थी, जबकि सैकड़ों लोग लापता बताए गए। प्रभावित क्षेत्र में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक और भारतीय भी थे। बाढ़ के कारण कई गांव, पुल, सड़कें और हाइड्रोपावर परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं। राहत और बचाव दल कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच अभियान चला रहे हैं।

इस पूरी घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर, भूस्खलन, नदी अवरोध और अचानक आने वाली बाढ़ किस तरह कुछ ही मिनटों में बड़ी तबाही में बदल सकते हैं। लैंगटांग लिरुंग ग्लेशियर से जुड़ी यह घटना सिर्फ नेपाल की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में बेहतर चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक निगरानी और सीमा पार आपदा प्रबंधन की जरूरत को भी सामने लाती है।

Disclaimer: इस खबर में प्राकृतिक आपदा के कारण और घटनाक्रम से जुड़ी वे जानकारियां, जिन्हें वैज्ञानिक विश्लेषण या उपलब्ध सैटेलाइट डेटा के आधार पर बताया गया है, उन्हें अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। घटना की वैज्ञानिक जांच और आधिकारिक आंकड़ों में बदलाव संभव है। मौतों, नुकसान और प्रभावित लोगों से जुड़े आंकड़े भी राहत एवं बचाव अभियान के दौरान अपडेट हो सकते हैं।

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Ashutosh Kumar Jha

Ashutosh Kumar Jha Admin

Ashutosh Kumar Jha एक डिजिटल पत्रकार और न्यूज़ लेखक हैं, जो भारत की राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, टेक्नोलॉजी और सामाजिक मुद्दों से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं। वे तथ्य आधारित रिपोर्टिंग और विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर समाचार लिखने के लिए जाने जाते हैं।डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहते हुए Ashutosh Jha ने कई महत्वपूर्ण विषयों पर विश्लेषणात्मक लेख और समाचार प्रकाशित किए हैं। उनका उद्देश्य पाठकों तक निष्पक्ष, प्रमाणिक और जनहित से जुड़ी जानकारी पहुँचाना है।वर्तमान में वे Khabar Aangan न्यूज़ प्लेटफॉर्म के माध्यम से देश-दुनिया की ताज़ा खबरों, सरकारी नीतियों, सामाजिक बदलाव और टेक्नोलॉजी से जुड़े विषयों पर नियमित लेखन और रिपोर्टिंग कर रहे हैं।

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