पटना, 2 सितंबर 2026: बिहार में लंबित मुकदमों के बीच पटना हाईकोर्ट से न्यायिक कामकाज की रफ्तार को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। हाईकोर्ट ने महज करीब एक महीने की अवधि में 17,213 मामलों का निपटारा किया, जबकि इसी दौरान 15,433 नए मामले दाखिल हुए। यानी अदालत ने जितने मामले नए आए, उससे भी अधिक मामलों का निपटारा किया। इस वजह से इस अवधि में केस क्लियरेंस रेट 111.53 प्रतिशत दर्ज किया गया।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी अदालत का केस क्लियरेंस रेट 100 प्रतिशत से ऊपर जाने का मतलब है कि वह नए दाखिल मामलों की तुलना में ज्यादा मामलों का निपटारा कर रही है। ऐसे में लंबित मामलों के बोझ को धीरे-धीरे कम करने में मदद मिल सकती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक यह प्रदर्शन 13 जुलाई से 18 अगस्त 2026 के बीच का है और इसी अवधि में 17,213 मामलों का निपटारा हुआ।
नए मामलों से ज्यादा पुराने मामलों का निपटारा
आंकड़ों को सरल तरीके से देखें तो इस अवधि में हाईकोर्ट में 15,433 नए मामले आए, लेकिन अदालत ने 17,213 मामलों को निपटा दिया। यानी दाखिल हुए मामलों से 1,780 अधिक मामलों का निपटारा हुआ। यही अंतर केस क्लियरेंस रेट को 100 प्रतिशत से ऊपर ले गया। न्यायिक व्यवस्था में इसे लंबित मामलों को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
इस उपलब्धि का असर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। जब किसी अवधि में निपटाए गए मामलों की संख्या नए मामलों से अधिक होती है, तो कुल लंबित मामलों का दबाव घटने की संभावना बनती है। हालांकि लंबित मामलों का वास्तविक बोझ कितना कम हुआ, यह जानने के लिए शुरुआत और अंत में कुल पेंडेंसी के आंकड़ों को भी देखना जरूरी होगा। इसलिए केवल इस एक महीने के प्रदर्शन को पूरी न्यायिक पेंडेंसी की तस्वीर नहीं माना जा सकता।
17,213 मामलों में किस तरह के केस शामिल रहे
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार निपटाए गए मामलों में अलग-अलग प्रकृति के मामले शामिल रहे। एक रिपोर्ट में कुल 17,107 मामलों के निपटारे का विवरण देते हुए 3,757 सिविल और 13,350 आपराधिक मामलों का उल्लेख किया गया है। इनमें करीब 12 हजार मामले जमानत से जुड़े थे और 2,850 सिविल मामलों में रिट आवेदन शामिल थे। अलग-अलग रिपोर्टों में कुल आंकड़े में मामूली अंतर दिखाई देता है, इसलिए 17,213 वाला आंकड़ा संबंधित अवधि के व्यापक केस-डेटा के रूप में देखना उचित है।
इस आंकड़े से यह भी पता चलता है कि आपराधिक मामलों और खासकर जमानत से जुड़े मामलों का निपटारा इस अवधि के कुल डिस्पोजल में बड़ा हिस्सा रहा। सिविल मामलों में रिट याचिकाओं का निपटारा भी उल्लेखनीय संख्या में हुआ। हालांकि हर श्रेणी के मामलों की अवधि, जटिलता और सुनवाई की प्रकृति अलग होती है, इसलिए केवल संख्या के आधार पर मामलों की न्यायिक कठिनाई की तुलना करना उचित नहीं होगा।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुधीर सिंह के कार्यकाल में बढ़ी रफ्तार
इस तेज निपटारे का समय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधीर सिंह के पदभार संभालने के बाद का है। उन्होंने 12 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला था। इसके बाद 13 जुलाई से 18 अगस्त के बीच 17,213 मामलों के निपटारे का आंकड़ा सामने आया है।
न्यायिक मामलों के निपटारे में केवल न्यायाधीशों की भूमिका ही नहीं होती। वकीलों, हाईकोर्ट रजिस्ट्री और पूरी न्यायिक प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यक्षमता भी इसमें महत्वपूर्ण होती है। इसी वजह से इस प्रदर्शन को किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि के बजाय पूरी न्यायिक व्यवस्था की सामूहिक कार्यक्षमता के संदर्भ में देखना ज्यादा उचित होगा। बिहार स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता रमाकांत शर्मा ने भी इस प्रदर्शन में न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं की भूमिका की सराहना की है।
111.53% केस क्लियरेंस रेट का क्या मतलब है
केस क्लियरेंस रेट यानी CCR किसी निश्चित अवधि में निपटाए गए मामलों की तुलना उसी अवधि में दाखिल हुए नए मामलों से बताता है। अगर यह आंकड़ा 100 प्रतिशत से अधिक है, तो इसका अर्थ है कि अदालत ने उस अवधि में नए दाखिल मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया। पटना हाईकोर्ट का 111.53 प्रतिशत CCR इसी स्थिति को दर्शाता है।
हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि हाईकोर्ट के सभी पुराने मामले खत्म हो गए हैं। अदालतों में वर्षों से लंबित मामलों की संख्या बड़ी हो सकती है और नए मामले लगातार दाखिल होते रहते हैं। इसलिए असली चुनौती इस रफ्तार को लंबे समय तक बनाए रखने और पुराने लंबित मामलों को लगातार कम करने की है। आने वाले महीनों के आंकड़े बताएंगे कि यह तेज निपटारा एक सीमित अवधि का प्रदर्शन रहा या न्यायिक पेंडेंसी घटाने की स्थायी दिशा बनती है।
बिहार की न्याय व्यवस्था के लिए क्यों अहम है यह आंकड़ा
पटना हाईकोर्ट में एक महीने के भीतर 17 हजार से ज्यादा मामलों का निपटारा न्यायिक प्रशासन की क्षमता और लंबित मामलों को कम करने की कोशिश के लिहाज से महत्वपूर्ण है। खासकर तब, जब अदालत ने उसी अवधि में दाखिल हुए मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि आने वाले महीनों में भी निपटारे की रफ्तार किस स्तर पर बनी रहती है और इसका कुल लंबित मामलों पर कितना वास्तविक असर पड़ता है।
Disclaimer – इस लेख में दिए गए आंकड़े उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों और संबंधित अवधि के केस-डिस्पोजल डेटा पर आधारित हैं। अलग-अलग रिपोर्टों में कुल निपटारे के आंकड़े में मामूली अंतर है, इसलिए आधिकारिक न्यायालयीय रिकॉर्ड को अंतिम आधार माना जाना चाहिए।
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