पटना, 2 सितंबर 2026: बिहार में अपनी जमीन को लेकर सरकारी कार्रवाई का सामना कर रहे लोगों के लिए पटना हाईकोर्ट का एक अहम फैसला सामने आया है। कोर्ट ने साफ किया है कि किसी जमीन को सिर्फ शिकायत या शुरुआती रिकॉर्ड के आधार पर सरकारी जमीन मानकर अतिक्रमण की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। खासकर ऐसी रैयती जमीन, जिस पर लंबे समय से जमाबंदी और राजस्व भुगतान के दस्तावेज मौजूद हों, उसके मामले में अधिकारियों को पहले जमीन की वास्तविक प्रकृति और विवाद की स्थिति की जांच करनी होगी।
यह मामला मधुबनी के अशर्फी यादव से जुड़ा था, लेकिन फैसले में कोर्ट ने ऐसी परिस्थितियों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश भी दिए हैं। न्यायमूर्ति राज कुमार की एकलपीठ ने 10 अगस्त 2026 के फैसले में कहा कि यदि जमीन की प्रकृति को लेकर वास्तविक और bona fide विवाद मौजूद है, तो ऐसे मामले को बिहार पब्लिक लैंड एन्क्रोचमेंट एक्ट, 1956 की संक्षिप्त प्रक्रिया के जरिए निपटाना उचित नहीं होगा।
करीब 100 साल पुराने जमीन विवाद में आया फैसला
मामले की जड़ करीब एक सदी पुरानी जमीन से जुड़ी है। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार अमरपुरा गांव में खेसरा संख्या 1099 की जमीन वर्ष 1926 में तत्कालीन दरभंगा महाराजा की ओर से अशर्फी यादव के दादा बाबू लाल गोप के पक्ष में बंदोबस्त की गई थी। परिवार का दावा था कि इसके बाद से वे लगातार जमीन पर शांतिपूर्ण कब्जे में रहे और उस जमीन की जमाबंदी भी चली आ रही थी। सरकार को राजस्व का भुगतान भी वर्ष 2013-14 तक किया गया था।

बाद में इसी जमीन के करीब 6 धुर हिस्से को लेकर अतिक्रमण की कार्रवाई शुरू हुई। अंचल अधिकारी ने अशर्फी यादव को अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया, जिसके खिलाफ उन्होंने अपील की। मामला आखिरकार पटना हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने पुराने रिकॉर्ड, जमाबंदी, जमीन के बंदोबस्त और अतिक्रमण की कार्यवाही में अपनाई गई प्रक्रिया को विस्तार से देखा।
कोर्ट ने अतिक्रमण का आदेश किया रद्द
हाईकोर्ट ने पाया कि अतिक्रमण की कार्रवाई के दौरान जमीन की प्रकृति को लेकर मौजूद महत्वपूर्ण सवालों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया था। अदालत ने कहा कि बिहार पब्लिक लैंड एन्क्रोचमेंट एक्ट केवल सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमण के मामलों के लिए है। यदि जमीन रैयती है और उसके संबंध में लंबे समय से जमाबंदी या पुराने बंदोबस्त जैसे दस्तावेज मौजूद हैं, तो उसे महज संक्षिप्त अतिक्रमण कार्यवाही के जरिए हटाने की प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती।
इसके आधार पर कोर्ट ने अंचल अधिकारी के 5 मई 2014 के आदेश और कलेक्टर की ओर से 18 नवंबर 2014 को पारित अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को चुनौती देने के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी।
अब पहले जांच होगी कि जमीन सरकारी है या रैयती
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अधिकारियों के लिए तय की गई प्रक्रिया है। कोर्ट ने कहा कि अतिक्रमण की शिकायत मिलने पर कलेक्टर या संबंधित अंचल अधिकारी को पहले यह देखना होगा कि विवादित जमीन वास्तव में सार्वजनिक जमीन है या नहीं। इसके साथ यह भी पता लगाना होगा कि जमीन की प्रकृति को लेकर पक्षों के बीच कोई वास्तविक विवाद मौजूद है या नहीं। ऐसी जांच किए बिना सीधे अतिक्रमण की कार्रवाई आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।
कोर्ट ने अधिकारियों को जमाबंदी, खतियान, रजिस्टर-2, टाइटल या बंटवारा वाद से जुड़े डिक्री जैसे दस्तावेजों पर विचार करने को कहा है। पुराने जमींदारों या महाराजाओं की ओर से किए गए बंदोबस्त, पट्टे और अन्य वैध दस्तावेज भी जांच के दायरे में रहेंगे। उद्देश्य यह है कि किसी वास्तविक जमीन मालिक को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया के आधार पर अतिक्रमणकारी घोषित न कर दिया जाए।
लंबे समय की जमाबंदी है तो राज्य को उठाना होगा अगला कदम
फैसले में लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को लेकर भी महत्वपूर्ण व्यवस्था बताई गई है। यदि किसी व्यक्ति के पास पुराने और पर्याप्त दस्तावेज हैं, जो उसके अधिकार, टाइटल या जमीन में हित का समर्थन करते हैं, तो ऐसे मामले को bona fide dispute माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में राज्य के लिए केवल अतिक्रमण की संक्षिप्त कार्यवाही पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि जमाबंदी या बंदोबस्त को चुनौती देने के लिए सक्षम सिविल कोर्ट का रास्ता अपनाना होगा।
वहीं, यदि कोई व्यक्ति अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज ही पेश नहीं करता है, तो स्थिति अलग होगी। ऐसे मामले में अपने अधिकार या टाइटल की घोषणा के लिए संबंधित व्यक्ति को सिविल कोर्ट जाने को कहा जा सकता है। यानी कोर्ट ने दोनों पक्षों के लिए दस्तावेज और वास्तविक विवाद की जांच को प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
अधिकारियों की मनमानी पर कोर्ट ने जताई चिंता
पटना हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि अतिक्रमण से जुड़े कई मामले रैयती जमीन को लेकर अदालत तक पहुंच रहे हैं। कोर्ट के सामने ऐसे मामलों की संख्या बढ़ने को लेकर चिंता व्यक्त की गई, जहां जमीन पर लंबे समय से राजस्व भुगतान और अन्य रिकॉर्ड मौजूद होने के बावजूद अतिक्रमण की कार्रवाई शुरू हो गई। अदालत ने ऐसी शिकायतों में अनावश्यक और मनमानी कार्रवाई से बचने की जरूरत पर जोर दिया।
फैसले में अधिकारियों के लिए यह भी स्पष्ट किया गया है कि कानून में निर्धारित सुनवाई और जांच की प्रक्रिया का पालन जरूरी है। शिकायत मिलने के बाद संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और दस्तावेज पेश करने का अवसर दिया जाना चाहिए। इसके बाद ही जमीन की प्रकृति और कथित अतिक्रमण को लेकर स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए।
जमीन मालिकों के लिए फैसले का क्या मतलब है
इस फैसले का सीधा मतलब यह नहीं है कि रैयती जमीन पर कभी अतिक्रमण की कार्रवाई नहीं हो सकती। यदि जमीन वास्तव में सार्वजनिक भूमि है और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बाद अतिक्रमण साबित होता है, तो कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन जहां जमीन के मालिकाना हक, पुराने बंदोबस्त या जमाबंदी को लेकर गंभीर और वास्तविक विवाद हो, वहां प्रशासन को पहले उस विवाद की प्रकृति समझनी होगी।
फैसले का व्यापक संदेश यही है कि अतिक्रमण की कार्रवाई रिकॉर्ड और कानून की प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए, केवल शिकायत के आधार पर नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि genuine अधिकार रखने वाले लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान या उनकी जमीन से बेदखल नहीं किया जाना चाहिए। अवैध तरीके से की गई तोड़फोड़ या अधिकार के मनमाने इस्तेमाल से नुकसान होने पर राज्य पर मुआवजे की जिम्मेदारी भी बन सकती है, जिसका निर्धारण मामले के तथ्यों के आधार पर होगा।
Disclaimer – यह लेख पटना हाईकोर्ट के 10 अगस्त 2026 के न्यायिक आदेश और उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। किसी व्यक्तिगत जमीन विवाद में कानूनी स्थिति संबंधित रिकॉर्ड, तथ्यों और सक्षम न्यायालय के आदेश पर निर्भर करेगी।
आपका छोटा सा सहयोग हमारी पत्रकारिता को नई मजबूती देता है।



