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Radhe Radhe महाराज जी,आज वो सब कुछ जीवन में मिल गया जिसकी चाह थी, परंतु फिर भी भीतर खालीपन और निरसता है।

जीवन की अस्थिरता और भक्ति मार्ग की चुनौतियों पर परम पूज्य श्री महाराज जी का दिव्य मार्गदर्शन। उन्होंने समझाया कि बाहरी सुख क्षणिक है, और मन को सतोगुण में बढ़ाने के लिए पवित्र अन्न, शुद्ध आचरण और निरंतर नाम जप आवश्यक है। श्री जी का नाम लेने मात्र से ही...
Khabar Aangan Published on: 1 नवम्बर 2025
Radhe Radhe महाराज जी,आज वो सब कुछ जीवन में मिल गया जिसकी चाह थी, परंतु फिर भी भीतर खालीपन और निरसता है।
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यह लेख पूज्य श्री हित प्रेमानंद जी महाराज और उनके विभिन्न भक्तों के बीच हुए एकांतिक वार्तालाप पर आधारित है, जिसमें महाराज जी ने अध्यात्म के मूलभूत सिद्धांतों, नाम जप के महत्व और जीवन के परम उद्देश्य पर गहन मार्गदर्शन दिया।

शून्य भीतर, भरा जीवन: आनंद की असली पहचान

भक्त : Radhe Radhe महाराज जी। मैंने बचपन से सपनों को पूरा करने के लिए बहुत मेहनत की। आज वो सब कुछ जीवन में मिल गया जिसकी चाह थी, परंतु भीतर खालीपन और निरसता है। मैं नाम जप और गुरु मंत्र भी कर रही हूँ, लेकिन मन में शांति महसूस नहीं होती।

महाराज जी: Radhe Radhe। यह गलत है कि आपको सब कुछ मिल गया है। भौतिक उपलब्धियाँ—गाड़ी, बंगला—ये सब शरीर छूटने पर यहीं रह जाएगा। आपको स्थाई सुख चाहिए, और यह स्थाई सुख केवल भगवान से मिलेगा। मन में शांति न होने का कारण यह है कि अभी पाप नष्ट नहीं हुए हैं। यदि आपके पाप 500 ग्राम हैं और भजन 50 ग्राम, तो आनंद का अनुभव नहीं होगा। जब भजन पापों से अधिक हो जाता है, तभी हृदय में आनंद का अनुभव होता है। इसीलिए, डट के और दीर्घ काल तक नाम जप करें।

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भगवान अंक हैं और माया शून्य है। भगवान से चित्त जुड़ना ही परम सुख है। अपवित्र भोजन (मांसाहार, शराब) और अपवित्र आचरण को वीआईपी संस्कृति मानने से बचना चाहिए। अपने जन्मदिन जैसे अवसरों पर भगवन नाम का कीर्तन करें और अच्छे पदार्थ पवाएँ, इससे जन्म सार्थक रहेगा।

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मन की चंचलता और सतोगुण का मार्ग

भक्त (राहुल गोयल जी, राजस्थान):Radhe Radhe महाराज जी, कभी-कभी बिना प्रयास के भजन अच्छा चलता है और कभी-कभी पूरी कोशिश के बाद भी मन याद ही नहीं रख पाता कि भजन करना है, तो भूल जाता हूँ।

महाराज जी: यह प्रकृति के तीन गुणों—सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण—का प्रभाव है। जब सतोगुण आता है, तो मन शांत होता है और भगवत चिंतन की इच्छा होती है। रजोगुण भोगों की ओर ले जाता है और तमोगुण आलस व प्रमाद पैदा करता है। जो निरंतर भजन करता है, वह इन गुणों को जीतकर त्रिगुणातीत हो जाता है।

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