मिथिला (बिहार): बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी प्रखंड में स्थित उच्चैठ भगवती मंदिर, केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि भारतीय इतिहास, वैदिक दर्शन और महाकवि कालिदास के ज्ञान-प्राप्ति की एक जीती-जागती गाथा है । स्थानीय रूप से इसे दुर्गस्थान या वनदेवी के रूप में जाना जाता है । यह स्थल मिथिला की शाक्त परंपरा का केंद्र रहा है, जिसे कई धार्मिक अधिकारी एक महत्वपूर्ण Shakti Pith मानते हैं ।
यह न्यूज़ आर्टिकल मिथिलांचल के इस प्राचीन मंदिर की गहन ऐतिहासिक जड़ों, इसकी रहस्यमय प्रतिमा विज्ञान और महाकवि कालिदास के साथ इसके कालजयी संबंध पर प्रकाश डालता है।
1. शीश-विहीन स्वरूप: रहस्यमयी छिन्नमस्तिका दुर्गा
उच्चैठ भगवती की मूर्ति काली शिला पर उत्कीर्ण है, और इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है इसका शीश-विहीन (बिना सिर का) स्वरूप । मूर्ति का केवल कंधे तक का हिस्सा ही दिखाई देता है, जिसके कारण स्थानीय रूप से इसे छिन्नमस्तिका दुर्गा के रूप में भी पूजा जाता है ।
प्रतिमा विज्ञान की विशिष्टताएँ: माता उच्चैठवासिनी की यह प्रतिमा काली ग्रेनाइट पत्थर में उकेरित है। देवी को सिंह की पीठ पर कमल की मुद्रा (सुखासन) में विराजमान दर्शाया गया है । मूर्ति अष्टभुजाधारी (आठ हाथों वाली) है, जो शंख, गदा, चक्र और पुष्प जैसे दिव्य आयुधों से सुशोभित है। इसके अलावा, उनके पैरों के तलवों पर एक चक्र उकेरा गया है, जो उनकी दिव्य उपस्थिति और सार्वभौमिक शक्ति का प्रतीक है ।
स्व-प्रकट स्वरूप की कथा: स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, सदियों पहले महाराजधिराज श्री रामेश्वर सिंह ने देवी की मूर्ति पर नया सिर स्थापित करने का प्रयास किया था। स्थापना की पूर्व संध्या पर, देवी ने स्वयं राजा के स्वप्न में आकर प्रश्न किया कि क्या यह सृष्टिकर्ता के लिए उचित है कि वह सृष्टिकर्ता का पुनर्निर्माण करे? इस दैवीय हस्तक्षेप के बाद, राजा ने सिर स्थापित करने का विचार त्याग दिया। वह निर्मित सिर आज भी मूर्ति के बगल में रखा हुआ है । यह कथा देवी की स्व-प्रकट (Swayambhu) प्रकृति और इस स्थल की विशिष्ट तांत्रिक पहचान को स्थापित करती है ।
