Suchna Se Sacchai Tak
ADVERTISEMENT

IN FOCUS

Advertisement
  1. Home
  2. Devotional
  3. बिहार का गुप्त Shaktipeeth? जानें, क्यों महान कवि कालिदास ने माँ ऊँचैठ के चरणों में झुकाया सिर | The Legend of Ucchaith Bhagwati

बिहार का गुप्त Shaktipeeth? जानें, क्यों महान कवि कालिदास ने माँ ऊँचैठ के चरणों में झुकाया सिर | The Legend of Ucchaith Bhagwati

जानिए, वह Shaktipeeth जहाँ मूर्ख कालिदास विश्व-कवि बने। मिथिला की वनदेवी, माँ ऊँचैठ भगवती के शीश-विहीन स्वरूप का रहस्य, प्राचीन ऋषि भूमि का इतिहास और गहन तांत्रिक साधना।
Khabar Aangan Published on: 23 अक्टूबर 2025
बिहार का गुप्त Shaktipeeth? जानें, क्यों महान कवि कालिदास ने माँ ऊँचैठ के चरणों में झुकाया सिर | The Legend of Ucchaith Bhagwati
ADVERTISEMENT

मिथिला (बिहार): बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी प्रखंड में स्थित उच्चैठ भगवती मंदिर, केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि भारतीय इतिहास, वैदिक दर्शन और महाकवि कालिदास के ज्ञान-प्राप्ति की एक जीती-जागती गाथा है । स्थानीय रूप से इसे दुर्गस्थान या वनदेवी के रूप में जाना जाता है । यह स्थल मिथिला की शाक्त परंपरा का केंद्र रहा है, जिसे कई धार्मिक अधिकारी एक महत्वपूर्ण Shakti Pith मानते हैं ।   

यह न्यूज़ आर्टिकल मिथिलांचल के इस प्राचीन मंदिर की गहन ऐतिहासिक जड़ों, इसकी रहस्यमय प्रतिमा विज्ञान और महाकवि कालिदास के साथ इसके कालजयी संबंध पर प्रकाश डालता है।

ADVERTISEMENT

1. शीश-विहीन स्वरूप: रहस्यमयी छिन्नमस्तिका दुर्गा

उच्चैठ भगवती की मूर्ति काली शिला पर उत्कीर्ण है, और इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है इसका शीश-विहीन (बिना सिर का) स्वरूप । मूर्ति का केवल कंधे तक का हिस्सा ही दिखाई देता है, जिसके कारण स्थानीय रूप से इसे छिन्नमस्तिका दुर्गा के रूप में भी पूजा जाता है ।   

प्रतिमा विज्ञान की विशिष्टताएँ: माता उच्चैठवासिनी की यह प्रतिमा काली ग्रेनाइट पत्थर में उकेरित है। देवी को सिंह की पीठ पर कमल की मुद्रा (सुखासन) में विराजमान दर्शाया गया है । मूर्ति अष्टभुजाधारी (आठ हाथों वाली) है, जो शंख, गदा, चक्र और पुष्प जैसे दिव्य आयुधों से सुशोभित है। इसके अलावा, उनके पैरों के तलवों पर एक चक्र उकेरा गया है, जो उनकी दिव्य उपस्थिति और सार्वभौमिक शक्ति का प्रतीक है ।   

ADVERTISEMENT

स्व-प्रकट स्वरूप की कथा: स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, सदियों पहले महाराजधिराज श्री रामेश्वर सिंह ने देवी की मूर्ति पर नया सिर स्थापित करने का प्रयास किया था। स्थापना की पूर्व संध्या पर, देवी ने स्वयं राजा के स्वप्न में आकर प्रश्न किया कि क्या यह सृष्टिकर्ता के लिए उचित है कि वह सृष्टिकर्ता का पुनर्निर्माण करे?  इस दैवीय हस्तक्षेप के बाद, राजा ने सिर स्थापित करने का विचार त्याग दिया। वह निर्मित सिर आज भी मूर्ति के बगल में रखा हुआ है । यह कथा देवी की स्व-प्रकट (Swayambhu) प्रकृति और इस स्थल की विशिष्ट तांत्रिक पहचान को स्थापित करती है ।   


2. मूर्खता से प्रतिभा का शिखर: कालिदास का दिव्य आशीर्वाद

उच्चैठ भगवती मंदिर की प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण महाकवि कालिदास से जुड़ा है। कालिदास, जो अपने प्रारंभिक जीवन में अत्यंत मूर्ख माने जाते थे और पत्नी विद्योत्तमा द्वारा तिरस्कृत किए गए थे , ज्ञान की खोज में यहीं आए थे ।   

ADVERTISEMENT

ज्ञान प्राप्ति का निर्णायक क्षण: किंवदंती है कि कालिदास देवी दुर्गा के दृढ़ भक्त थे । प्राचीन काल में, इस मंदिर परिसर के आसपास एक प्रसिद्ध संस्कृत पाठशाला (कॉलेज) हुआ करता था, जहाँ माना जाता है कि कालिदास एक सेवक के रूप में रहते थे और यहीं से उनकी साधना शुरू हुई थी ।   

कालिदास की निष्ठा का चरम तब दिखा जब एक रात, भयंकर तूफान आया। उन्होंने थुम्हनी नदी (जो मंदिर के पास बहती थी) को अपने प्राणों को जोखिम में डालकर पार किया, ताकि मंदिर का दीपक बुझने न पाए । उनकी इस असाधारण निष्ठा (dedication) से प्रभावित होकर माता दुर्गा उनके सामने प्रकट हुईं ।   

देवी ने कालिदास से वरदान मांगने को कहा, और उन्होंने अपनी अज्ञानता से उपजी पीड़ा को याद करते हुए केवल ज्ञान (विद्या) का वरदान माँगा । देवी ने उन्हें यह आशीर्वाद दिया कि “आज रात आप जिस भी पुस्तक को स्पर्श करेंगे, आपको उस पुस्तक का ज्ञान प्राप्त हो जाएगा” ।   

इस दिव्य आशीर्वाद के बाद, कालिदास मूर्खता के पर्याय से विद्वता के पर्याय में परिवर्तित हो गए । उन्होंने तत्काल संस्कृत साहित्य की कालजयी रचनाएँ कीं, जिनमें अभिज्ञान शाकुन्तलम्मेघदूतम, और रघुवंशम् जैसी विश्वविख्यात कृतियाँ शामिल हैं । आज भी इस विरासत को पास के शिक्षण संस्थान ‘कालिदास विद्यापति साइंस कॉलेज’ के नाम से जाना जाता है ।   


3. ऋषि भूमि, तांत्रिक केंद्र और Shaktipeeth की दावेदारी

उच्चैठ भगवती मंदिर का स्थान प्राचीन काल से ही एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र रहा है, जिसे कई साक्ष्य प्राचीन मिथिला विश्वविद्यालय का केंद्र मानते हैं ।   

वैदिक दर्शन का केंद्र: यह स्थल भारतीय दर्शन की आधारशिला रखने वाले कई महान महर्षियों की तपस्या स्थली रहा है। इनमें सांख्य दर्शन के महर्षि कपिल, वैशेषिक दर्शन के महर्षि कणाद, न्याय दर्शन के गौतम, जैमिनी, पुंडरिक और वशिष्ठ जैसे महान ऋषि शामिल हैं । पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा जनक, भगवान राम और कवि विद्यापति ने भी इस परिसर में साधना की थी । मंदिर परिसर के प्रवेश द्वार पर वैदिक ऋषि याज्ञवल्क्य की मूर्ति स्थापित है, जो इस ज्ञान परंपरा को सम्मान देती है ।   

उमा Shaktipeeth का दावा: उच्चैठ दुर्गस्थान को स्पष्ट रूप से Shakta Pithas में गिना जाता है । पीठा निर्णय तंत्र (Peetha Nirnaya Tantra) जैसे शास्त्रों में वर्णित है कि मिथिला Shaktipeeth वह स्थान है जहाँ देवी सती का वाम स्कन्ध (Left Shoulder) गिरा था और देवी को ‘उमा’ नाम से जाना जाता है। कई अधिकारी और विद्वान इसी उच्चैठ भगवती मंदिर को ‘जनकपुर के निकट वनदुर्गा मंदिर’ के रूप में पहचानते हैं, जिसे उमा Shaktipeeth कहा गया है । इसकी भौगोलिक स्थिति—जो जनकपुर से केवल 15 किलोमीटर पूर्व में है—इस दावे को मजबूती प्रदान करती है ।   

तांत्रिक साधना का केंद्र: इस मंदिर के आसपास एक समय श्मशान घाट (श्मशान भूमि) मौजूद थी । यह जुड़ाव स्पष्ट करता है कि यह स्थल आरंभ से ही गहन तांत्रिक साधनाओं का केंद्र रहा है । यही कारण है कि आज भी Tantra seekers (तंत्र साधक) यहाँ आकर साधना करते हैं और Tantric achievements (तांत्रिक सिद्धियाँ) प्राप्त करते हैं ।   


4. अनुष्ठान और मंदिर का प्रबंधन

विशेष अनुष्ठान और दिव्य अनुभूति: यह मंदिर मिथिला समुदाय के लिए धार्मिक और सामाजिक जीवन का केंद्र है। मानक पूजा-अर्चना के अलावा, यहाँ मुंडनउपनयन और विवाह जैसे महत्वपूर्ण जीवन संस्कार आयोजित किए जाते हैं । यहाँ शारदीय नवरात्रि के दौरान दुर्गा पूजा धूमधाम से मनाई जाती है, जिसमें बलि प्रदान का अनुष्ठान भी होता है, जो देवी के उग्र शाक्त रूप की पूजा को दर्शाता है ।   

यहाँ का धार्मिक वातावरण विशेष रूप से गहन है। बुजुर्गों और साधकों का मानना है कि प्रत्येक पूर्णिमा एवं अमावस्या की मध्य रात्रि में परिसर का वातावरण किसी अदृश्य दिव्य शक्ति के अधीन रहता है। इस अवधि में साधकों को अलौकिक शक्ति और शांत वातावरण में साधना की आहट की अनुभूति होती है, क्योंकि माना जाता है कि दिव्य शक्तियों का यहाँ साधना के लिए आगमन होता है।

आधुनिक प्रबंधन: इस प्राचीन स्थल का सामाजिक-आर्थिक महत्व इतना अधिक रहा है कि मंदिर के रखरखाव को लेकर 26 वर्ष तक कानूनी विवाद चला । 1 मार्च 1997 को मधुबनी के जिला सत्र न्यायालय ने इस मामले में एक council (कमेटी) के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे मंदिर की देखभाल और रखरखाव की जिम्मेदारी सौंपी गई ।   

यह स्थल ज्ञान, शक्ति और इतिहास का एक अद्वितीय संगम है, जो आज भी भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक हृदय को पोषित कर रहा है।

इस खबर को शेयर करें
Khabar Aangan

Khabar Aangan Admin

Khabar Aangan एक स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म है, जो सूचना से सच्चाई तक की यात्रा को समर्पित है। हमारा उद्देश्य है—स्थानीय मुद्दों से लेकर राष्ट्रीय घटनाओं तक, हर खबर को गहराई, संदर्भ और निष्पक्षता के साथ प्रस्तुत करना। हम परंपरागत पत्रकारिता को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ते हैं, ताकि पाठकों को मिले स्पष्ट, विश्वसनीय और प्रभावशाली जानकारी। चाहे बात हो प्रशासनिक विफलता की, या सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता की, या सामाजिक बदलाव की—Khabar Aangan हर विषय को संवेदनशीलता और साहस के साथ उठाता है।

आपका छोटा सा सहयोग हमारी पत्रकारिता को नई मजबूती देता है।

GPay UPI Paytm AmazonPay Razorpay

WELCOME TO KHABAR AANGAN Suchna Se Sacchai Tak