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एक VOTE की कीमत: जब एक गलती पूरे समाज को पाँच साल पीछे धकेल देती है

जब आप बिना सोचे-समझे, सिर्फ पार्टी या जाति देखकर वोट डालते हैं, तो यह केवल एक VOTE नहीं — यह पाँच साल की नीतियों, एक परिवार की तकलीफ और समाज की दिशा तय करने जैसा होता है। इसलिए सोच-समझकर और समझदारी से वोट करें
Khabar Aangan Published on: 6 नवम्बर 2025
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तुम्हारे हाथ में एक छोटा सा परचा- सा लगता है — काला निशान, एक लाइन। पर वह एक छोटी सी रेखा पांच साल की नीति, एक बच्चे की पढ़ाई, एक किसान की उम्मीद, और हमारे बुज़ुर्गों की सुरक्षा का फैसला कर देती है। जब हमने इसे सहजता से, बिना सोचे-समझे भर दिया, तो क्या हम समझते हैं कि हमने किसे हरा दिया — या किसे जीता दिया?

यह कहानी साधारण नहीं है। यह वही कहानी है जब कोई सोचता भी नहीं — “बस अपनी जाति ने कहा, या पार्टी वाला पोस्टर अच्छा दिखा, या चाय वाला कह गया” — और बिना जांचे-परखे उसने अपने मताधिकार को दे दिया। यही है वो पल जिसे मैं बोलकर बताना चाहता हूँ: “1 galat vote aur 5 saal ki chot” — एक वोट की गलती पाँच साल तक सबको भुगतनी पड़ती है।

क्यों फर्क पड़ता है — वोट सिर्फ कागज़ नहीं

हर नीति, हर बजट, हर सरकारी योजना का असर हमारे रोज़मर्रा पर होता है। सड़कों की हालत, अस्पताल की दवाइयाँ, स्कूल की लाइब्रेरी — यह सब उसी सरकार के निर्णयों से बनते या बिगड़ते हैं। एक उम्मीदवार जो विकास की योजना जानता हो, जो स्थानीय समस्याएँ समझे, जो जवाबदेही निभाये, वही आपके मुहब्बत में आपके घर का हाल बदल सकता है।

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लेकिन क्या होगा अगर आपने केवल “नाम” या “रंग” देखकर VOTE दे दिया? क्या होगा अगर वही व्यक्ति भ्रष्ट, अक्षम या जातिगत राजनीति का प्यादा निकला? तब वही एक “1 galat vote” बनकर लौटता है — और अगले पाँच साल आपको उसकी खामियों का बोझ उठाना होता है।

5 साल — सिर्फ एक अवधि नहीं, जिंदगी की कमिटमेंट है

पांच साल छोटी अवधि नहीं है। पाँच साल में बच्चे बड़ी कक्षाएँ पढ़ते हैं, खेतों में पैदावार घटती या बढ़ती है, छोटे व्यवसाय बंद या चले जाते हैं। पाँच साल में किसी अस्पताल की कंसल्टेन्सी बदल सकती है, और उस बदलाव का असर हमारे घरों तक पहुँचता है। इसलिए वोट देना इच्छा नहीं, जिम्मेदारी है।

यदि आप चुनते हैं कि “बस वही जीतेगा जो मेरे समुदाय का है”, तो क्या आपने पूछा कि क्या उसके पास योजना है? क्या उसने ट्रैक रिकॉर्ड दिया? या सिर्फ नाम और रंग ने आपको धोखा दे दिया? यही छोटी-छोटी अनदेखी एक बड़े संकट में बदल जाती है — और तब हम कहते हैं, “काश हमने सही देखा होता।”

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