दिल्ली, 2 अप्रैल, 2026: भारत, जो कभी ऊर्जा के लिए कोयले और आयातित जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भर था, आज एक अभूतपूर्व हरित ऊर्जा क्रांति का साक्षी बन रहा है। 2 अप्रैल, 2026 तक, देश ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मोर्चे पर कई मील के पत्थर हासिल किए हैं, जिससे न केवल उसकी ऊर्जा सुरक्षा बढ़ी है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक प्रयासों में भी उसका योगदान गहरा हुआ है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की दिशा में यह यात्रा तेजी से आगे बढ़ रही है, और 2026 का यह वर्ष इस संक्रमण काल में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
अभूतपूर्व क्षमता वृद्धि:
पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। 2026 तक, देश ने अपनी कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को सफलतापूर्वक 200 गीगावाट (GW) के आंकड़े से ऊपर पहुंचा दिया है, जिसमें सौर ऊर्जा का प्रमुख योगदान है।
राजस्थान के जैसलमेर और भड़ला तथा गुजरात के धोलेरा जैसे विशाल सौर पार्कों ने अपनी पूरी क्षमता से काम करना शुरू कर दिया है, जिससे लाखों घरों और उद्योगों को स्वच्छ बिजली मिल रही है। इन पार्कों में फ्लोटिंग सोलर और एग्रोवोल्टेइक जैसी नवीनतम तकनीकों का भी सफल परीक्षण किया गया है।
पवन ऊर्जा ने भी तटीय राज्यों जैसे गुजरात, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में अपनी उपस्थिति मजबूत की है, जहाँ नई पीढ़ी की हाई-कैपेसिटी पवन टर्बाइनों की स्थापना से ऊर्जा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। बायोमास और छोटे पनबिजली संयंत्र भी ऊर्जा मिश्रण को विविधता प्रदान कर रहे हैं।
आर्थिक विकास का इंजन:
हरित ऊर्जा क्षेत्र में यह उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा वरदान साबित हुआ है। लाखों नए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं, जिनमें नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों के विनिर्माण, स्थापना, ग्रिड एकीकरण, रखरखाव और अनुसंधान एवं विकास जैसे उच्च-कुशल क्षेत्र शामिल हैं।
सरकार की “मेक इन इंडिया” पहल के तहत, सौर पैनल, बैटरी स्टोरेज उपकरण, और ग्रीन हाइड्रोजन इलेक्ट्रोलाइज़र बनाने वाली स्वदेशी कंपनियों को उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के माध्यम से महत्वपूर्ण समर्थन मिल रहा है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हुई है।
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि भारत हरित ऊर्जा में वैश्विक निवेश के लिए सबसे आकर्षक स्थलों में से एक बन गया है, जिसने पिछले वित्तीय वर्ष में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में 30% से अधिक की वृद्धि दर्ज की है।
सामाजिक प्रभाव और टिकाऊ शहरीकरण:
स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है; इसका गहरा सामाजिक प्रभाव भी है। प्रमुख भारतीय शहरों में वायु प्रदूषण के स्तर में लगातार कमी आ रही है, जिससे नागरिकों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में, विशेषकर दूरदराज के इलाकों में, सौर माइक्रोग्रिड परियोजनाओं ने बिजली तक पहुंच सुनिश्चित की है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय व्यवसायों को नई गति मिली है।
किसानों को सौर ऊर्जा-आधारित सिंचाई पंपों से लाभ मिल रहा है। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में भी हरित ऊर्जा के एकीकरण को प्राथमिकता दी जा रही है, जैसे कि सार्वजनिक परिवहन के लिए इलेक्ट्रिक बसों का व्यापक उपयोग, स्मार्ट स्ट्रीट लाइटिंग और इमारतों पर सौर पैनलों की अनिवार्य स्थापना। कई राज्यों ने अपने स्वयं के “ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर” स्थापित किए हैं, जो नवीकरणीय ऊर्जा को राष्ट्रीय ग्रिड में कुशलता से एकीकृत कर रहे हैं।
चुनौतियाँ और आगे का मार्ग:
हालांकि प्रगति उत्साहजनक है, चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। ऊर्जा भंडारण एक प्रमुख बाधा बनी हुई है, खासकर जब सौर ऊर्जा सूर्यास्त के बाद अनुपलब्ध हो जाती है और पवन ऊर्जा की प्रकृति परिवर्तनशील होती है। बैटरी स्टोरेज तकनीक को और अधिक किफायती और कुशल बनाने के लिए अनुसंधान और विकास में तेजी लाने की आवश्यकता है।
भूमि अधिग्रहण की जटिलताएँ, ग्रिड एकीकरण की तकनीकी जटिलताएँ और वित्तीय संसाधनों की निरंतर उपलब्धता भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर ध्यान देना होगा। ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, जिसे भारत ने एक बड़ी छलांग के रूप में देखा है, अभी भी अपने प्रारंभिक चरण में है और बड़े पैमाने पर उत्पादन व वितरण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए महत्वपूर्ण निवेश और तकनीकी नवाचार की आवश्यकता होगी।
सरकारी नीतियाँ और भविष्य की दृष्टि:
भारत सरकार ने हरित ऊर्जा संक्रमण को गति देने के लिए कई दूरदर्शी नीतियाँ लागू की हैं। इनमें नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ, आसान ऋण उपलब्धता, कर में छूट और अनुसंधान एवं विकास के लिए सब्सिडी शामिल हैं।
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के माध्यम से, भारत वैश्विक मंच पर हरित ऊर्जा सहयोग का नेतृत्व कर रहा है। ऊर्जा मंत्री आर.के. सिंह ने हाल ही में एक बयान में कहा, “भारत की हरित ऊर्जा यात्रा न केवल हमारी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत और एक स्वस्थ ग्रह के लिए हमारी प्रतिबद्धता का प्रतीक भी है।
हम 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और 2026 के ये मील के पत्थर हमें सही दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं।” विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ग्रिड इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, स्मार्ट ग्रिड तकनीकों में निवेश करने और ऊर्जा भंडारण समाधानों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष:
2026 में, भारत अपनी हरित ऊर्जा क्रांति के एक रोमांचक चरण में खड़ा है। यह न केवल तकनीकी और आर्थिक परिवर्तन का दौर है, बल्कि एक सांस्कृतिक बदलाव का भी प्रतीक है जहाँ टिकाऊपन और पर्यावरण संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गए हैं।
‘खोजो, बदलो और आगे बढ़ो’ के सिद्धांत पर चलते हुए, भारत वैश्विक हरित ऊर्जा मानचित्र पर एक अग्रणी शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को और मजबूत कर रहा है, जिससे एक स्वच्छ, हरित और अधिक टिकाऊ भविष्य की नींव रखी जा रही है – केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए।
Source: https://www.thehindu.com/
- ‘महाभारत’ की कृपी और दिग्गज एक्ट्रेस आशा सिंह जयसवाल का निधन, 22 अगस्त की शाम ली आखिरी सांस
- वंदे मातरम् पर कांग्रेस के फैसले के बीच शशि थरूर ने साफ किया रुख, बोले- पार्टी की पुरानी परंपरा आगे भी जारी रहेगी
- वंदे मातरम् विवाद पर कंगना रनौत ने शर्मिला टैगोर को घेरा, बोलीं हिंदू-मुस्लिम मानसिकता से बाहर आइए
- भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर दुनिया का सलाम, ट्रंप-पुतिन समेत कई नेताओं ने क्या कहा
- 80वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्र के नाम संदेश: परीक्षा सुधारों से लेकर ‘विकसित भारत 2047’ तक पर बड़ा बयान
आपका छोटा सा सहयोग हमारी पत्रकारिता को नई मजबूती देता है।



