नई दिल्ली, 15 सितंबर 2026: अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान निजी जमीन पर बनी इमारत भी गिरा देने के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने माना कि प्रशासन ने कार्रवाई की तय सीमा से आगे जाकर याचिकाकर्ताओं की इमारत को भी गिरा दिया। इसके बाद कोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को अपने खर्च पर पूरी इमारत दोबारा बनाने, तब तक मुफ्त वैकल्पिक आवास देने और 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
सरकारी जमीन के अतिक्रमण से शुरू हुआ था मामला
मामला पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले का है। याचिकाकर्ता कबिता मन्ना और एक अन्य ने मौजा नाइकुरी जगन्नाथचक में LR Plot No. 650 पर दो मंजिला व्यावसायिक इमारत बनाई थी। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, यह निर्माण स्थानीय ग्राम पंचायत से स्वीकृत नक्शे के आधार पर किया गया था और इमारत में व्यवसाय भी संचालित किया जा रहा था।
विवाद आसपास की सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण से जुड़ा था। सरकारी जमीन के प्लॉट नंबर 1 और 12 पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जानी थी। इसी कार्रवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि प्रशासन ने सरकारी जमीन से आगे बढ़कर उनकी निजी जमीन के LR Plot No. 650 पर बनी पूरी इमारत भी गिरा दी।
नक्शे और रिकॉर्ड ने खोला कार्रवाई का दायरा
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन ने राजस्व निरीक्षक की अलग-अलग तारीखों की रिपोर्ट और स्केच मैप सहित रिकॉर्ड की जांच की। अदालत के सामने रखे दस्तावेजों में LR Plot Nos. 649, 650, 1 और 12 को आपस में सटे हुए प्लॉट बताया गया था।
रिकॉर्ड के अनुसार सरकारी जमीन पर अतिक्रमण प्लॉट नंबर 1 और 12 पर चिन्हित था। अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों की तुलना कार्रवाई के दौरान तैयार रिकॉर्ड से की और पाया कि विध्वंस की कार्रवाई याचिकाकर्ताओं की निजी जमीन तक भी पहुंची थी। इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि प्रशासन ने अधिकृत कार्रवाई की सीमा पार कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा, निजी इमारत गिराने की कार्रवाई गैरकानूनी
अदालत ने अपने 8 सितंबर 2026 के फैसले में याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं की LR Plot No. 650 पर बनी इमारत को गैरकानूनी तरीके से गिराया। कोर्ट के मुताबिक उपलब्ध दस्तावेज इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त थे और मामले में मौजूद तथ्यात्मक विवाद को रिट कार्यवाही में ही तय किया जा सकता था।
मामला पश्चिम बंगाल हाईवे एक्ट, 1964 की धारा 10(2) और 10(3) के तहत अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से जुड़ा था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस जमीन पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई होनी थी, उससे आगे जाकर निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना उस कार्रवाई के अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
अब प्रशासन को अपने खर्च पर बनानी होगी नई इमारत
हाईकोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को आदेश दिया है कि वह अपने खर्च पर नई इमारत का निर्माण करे। निर्माण याचिकाकर्ताओं के स्वीकृत नक्शे के अनुसार करना होगा और फैसले की प्रति मिलने के बाद दो साल के भीतर इसे पूरा करना होगा।
निर्माण पूरा होने के बाद इमारत का कब्जा याचिकाकर्ताओं को सौंपना होगा। अदालत ने इस समयसीमा को अनिवार्य बताया है।
इतना ही नहीं, नई इमारत तैयार होने तक प्रभावित याचिकाकर्ताओं को मुफ्त वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का भी आदेश दिया गया है। अदालत ने कहा कि यह आवास संभव हो तो उसी इलाके में दिया जाए, ताकि इमारत के दोबारा बनने तक उन्हें रहने की समस्या न हो।
10 लाख रुपये का मुआवजा भी देना होगा
अदालत ने संबंधित प्राधिकरण को याचिकाकर्ताओं को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। यह रकम दो बराबर किस्तों में दी जानी है। पहली किस्त 31 अक्टूबर 2026 तक और दूसरी किस्त 28 फरवरी 2027 तक भुगतान करने का निर्देश दिया गया है।
इस फैसले में अदालत ने केवल आर्थिक मुआवजे तक मामला सीमित नहीं रखा, बल्कि गिराई गई इमारत को दोबारा बनाने और तब तक वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का भी आदेश दिया। इससे साफ है कि अदालत ने संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई के लिए व्यापक राहत दी है।
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