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Chhath Pooja : बिहार की आत्मा, बिहारी संस्कृति का अमर स्वर

छठ पूजा 2025 बिहार का सबसे भव्य और आध्यात्मिक महापर्व है, जो सूर्य और छठी मइया की आराधना का प्रतीक है। गंगा तट पर सूर्य को अर्घ्य, भोजपुरी लोकगीत, और ठेकुआ प्रसाद के साथ यह त्योहार बिहारी संस्कृति की सादगी और एकता को दर्शाता है। जानें छठ पूजा की तिथियां,...
Khabar Aangan Published on: 16 अक्टूबर 2025
Chhath Pooja : बिहार की आत्मा, बिहारी संस्कृति का अमर स्वर
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Chhath Pooja , पटना, 16 अक्टूबर 2025 – सूर्य की किरणों से जगमगाता बिहार एक बार फिर छठ महापर्व की तैयारी में डूबा हुआ है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होने वाला यह चार दिवसीय पर्व, जो 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक चलेगा, न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि बिहारी संस्कृति की जड़ों को मजबूत करने वाला एक सामूहिक उत्सव भी है।

इस वर्ष छठ पूजा का महत्व और भी अधिक हो गया है, क्योंकि यह दीवाली के ठीक बाद आ रहा है, जब प्रवासी बिहारी अपने घर लौटकर मां गंगा के तट पर सूर्य देव और छठी मइया को अर्घ्य चढ़ाने को आतुर होंगे। बिहार सरकार ने भी घाटों की सफाई, सुरक्षा और प्रसारण की व्यापक व्यवस्था की है, ताकि दूर-दराज में रहने वाले बिहारी वर्चुअल रूप से जुड़ सकें।

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छठ पूजा बिहार की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग है। यह पर्व सूर्य देव की आराधना पर आधारित है, जो जीवन का आधार माने जाते हैं। वैदिक काल से चली आ रही यह परंपरा आज भी बिहार के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी घाटों तक जीवंत है। बिहारी समाज में छठ को ‘महापर्व’ कहा जाता है, क्योंकि यह परिवार, समुदाय और प्रकृति के बीच एक सेतु का काम करता है।

महिलाओं का 36 घंटे का निर्जला व्रत, लोकगीतों की मधुर धुनें, और पर्यावरण अनुकूल पूजा – ये सब मिलकर बिहारी जीवनशैली की सादगी और गहराई को दर्शाते हैं। इस वर्ष, छठ पूजा के दौरान पटना के दीघा घाट पर लाखों श्रद्धालुओं के जुटने की उम्मीद है, जहां मंडलायुक्त ने खुद जाकर तैयारियों का निरीक्षण किया।

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Chhath Pooja का ऐतिहासिक महत्व: वैदिक जड़ों से बिहारी लोक परंपरा तक

छठ पूजा की जड़ें वैदिक साहित्य में खोजी जा सकती हैं, जहां सूर्य को ‘प्राणदाता’ कहा गया है। ऋग्वेद में सूर्य की स्तुति के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन बिहार में इसका वर्तमान स्वरूप लोक कथाओं से जुड़ा है। एक प्रमुख कथा राजा जनक की पुत्री सीता से संबंधित है। वनवास के दौरान सीता ने छठ व्रत रखा, जिससे उन्हें लव-कुश जैसे पुत्र प्राप्त हुए।

रामायण के अनुसार, सीता ने गंगा तट पर सूर्य और छठी मइया की पूजा की, जो आज भी मुंगेर के सीता चरन मंदिर में जीवंत है। एक अन्य कथा मगध के राजा जरासंध की है, जिन्हें कोढ़ रोग से छुटकारा पाने के लिए छठ व्रत का निर्देश मिला। बिहार की नदियों में सल्फर और आर्सेनिक की प्राकृतिक उपस्थिति को वैज्ञानिक रूप से भी सूर्य पूजा से जोड़ा जाता है, जो त्वचा रोगों में लाभकारी मानी जाती है।

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बिहार में छठ की परंपरा प्राचीन है। मौर्य काल से ही सूर्य मंदिरों का उल्लेख मिलता है, लेकिन आधुनिक छठ बिहारी लोक संस्कृति का हिस्सा बन गया। यह पर्व दो बार मनाया जाता है – चैती छठ (मार्च-अप्रैल) और कार्तिक छठ (अक्टूबर-नवंबर)। चैती छठ को कम महत्व दिया जाता है, लेकिन कार्तिक छठ बिहार का सबसे बड़ा त्योहार है।

2025 में चैती छठ 1 से 4 अप्रैल तक मनाया गया, जहां गोपालगंज जैसे जिलों में घाट सजाए गए। लेकिन कार्तिक छठ ही बिहार की असली धड़कन है, जो प्रवासी बिहारियों को घर खींच लाता है।

बिहारी संस्कृति में छठ: एकता, सादगी और लोक कला का संगम

बिहारी संस्कृति में छठ पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। बिहार के गांवों में, जहां कृषि जीवन का आधार है, छठ फसल कटाई के बाद आभार व्यक्त करने का माध्यम है। सूर्य को ऊर्जा का स्रोत मानकर किसान अपनी समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। महिलाएं व्रत रखती हैं, जो परिवार की लंबी आयु और संतान के लिए समर्पित होता है। पुरुष भी सहयोग करते हैं – प्रसाद बनाना, घाट सजाना, और बच्चों को लोकगीत सिखाना।

लोक संगीत छठ का अभिन्न हिस्सा है। भोजपुरी और मैथिली में गाए जाने वाले छठ गीत, जैसे ‘उगा हो सूरुज देव’ या ‘छठी मइया हमरो कवन जत चली’, पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। पद्मश्री शारदा सिन्हा की आवाज ने इन्हें अमर बना दिया, हालांकि 2025 में उनकी कमी खलेगी। ये गीत बिहारी जीवन की कहानियां कहते हैं – नदियों का महत्व, मां का त्याग, और प्रकृति से प्रेम। नृत्य भी शामिल होता है, जहां महिलाएं साड़ी में थिरकती हैं, जो बिहार की पारंपरिक नृत्य शैली को जीवंत करता है।

पर्यावरणीय दृष्टि से छठ अनूठा है। कोई मूर्ति पूजा नहीं, कोई पटाखे नहीं – केवल जल अर्घ्य और बांस की टोकरी में फल-सब्जियां। पर्यावरणविद इसे ‘इको-फ्रेंडली’ फेस्टिवल कहते हैं। बिहार सरकार ने 2025 में घाटों पर सीसीटीवी और ड्रोन निगरानी की व्यवस्था की है, साथ ही प्लास्टिक मुक्त अभियान चलाया।

Chhath Pooja 2025: तिथियां, रीति-रिवाज और पूजा विधि

2025 में छठ पूजा 25 अक्टूबर (शनिवार) से शुरू होकर 28 अक्टूबर (मंगलवार) को समाप्त होगा। यह लंबा वीकेंड होने से प्रवासियों के लिए सुविधाजनक है। मुख्य तिथियां इस प्रकार हैं:

  • नहाय-खाय (25 अक्टूबर): व्रत की शुरुआत। महिलाएं पवित्र नहान करती हैं और कद्दू-भात का शाकाहारी भोजन ग्रहण करती हैं। घर की सफाई और पूजा सामग्री जुटाना प्रमुख होता है। मुहूर्त: सूर्योदय के बाद।
  • खरना (26 अक्टूबर): निर्जला व्रत का पहला दिन। शाम को गुड़ की रोटी और चना का प्रसाद। यह व्रत माता धरती को समर्पित है। महिलाएं पूरे दिन उपवास रखती हैं, जो 36 घंटे तक चलता है।
  • संध्या अर्घ्य (27 अक्टूबर): मुख्य दिन। शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य। बांस की टोकरी में ठेकुआ, फल, नारियल और सिंघाड़ा रखा जाता है। पटना के गांधी घाट पर लाखों लोग जुटेंगे। मुहूर्त: सूर्यास्त 5:40 बजे के आसपास।
  • उषा अर्घ्य (28 अक्टूबर): व्रत समापन। भोर में उदीयमान सूर्य को अर्घ्य। प्रसाद वितरण के बाद परिवार में हर्षोल्लास। मुहूर्त: सूर्योदय 6:30 बजे।

पूजा सामग्री में ठेकुआ अनिवार्य है – गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बनी खाजूर जैसी मिठाई, जो बिहारी रसोई की शान है। अन्य प्रसाद: रसबली (चावल की पूड़ी दूध में), कサー लड्डू, और पीठा। ये व्यंजन बिना प्याज-लहसुन के बनाए जाते हैं, जो सात्विकता का प्रतीक हैं।

बिहार में छठ की भव्यता: घाटों का जादू और सामुदायिक सहयोग

बिहार में छठ पूजा का स्वरूप ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर अलग-अलग दिखता है। पटना, भागलपुर और मुजफ्फरपुर जैसे शहरों में बड़े घाट सजाए जाते हैं, जहां रंगोली, दीये और गन्ने के छत्र लगाए जाते हैं। दीघा-गंडा घाट पर 2025 में लाइव प्रसारण होगा, ताकि दिल्ली-मुंबई में रहने वाले बिहारी जुड़ सकें। ग्रामीण इलाकों में, जैसे वैशाली या समस्तीपुर, पूजा सरल होती है – नदी किनारे परिवार के साथ।

समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण है। पड़ोसी मिलकर घाट साफ करते हैं, प्रसाद बांटते हैं। स्कूल-कॉलेज 25-28 अक्टूबर तक बंद रहेंगे, जो बच्चों को उत्सव में भाग लेने का अवसर देगा। बिहार सरकार ने ‘छठ महोत्सव’ के तहत सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए हैं, जिसमें लोक नृत्य और गीत प्रतियोगिताएं शामिल हैं।

बिहारी प्रवासियों के लिए छठ: घर वापसी का संदेश

छठ पूजा बिहारी प्रवासियों की भावनाओं को छूता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और विदेशों में बिहारी समुदाय पार्कों और कृत्रिम तालाबों पर छठ मनाते हैं। 2025 में, लंबा वीकेंड होने से लाखों लोग ट्रेनों से लौटेंगे। यह पर्व उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ता है – बिहार की मिट्टी, गंगा का पानी, और परिवार की गोद। एक प्रवासी बिहारी कहते हैं, “छठ के बिना बिहार अधूरा है। यह हमारी पहचान है।”

सांस्कृतिक रूप से, छठ बिहारी सिनेमा और साहित्य को भी प्रभावित करता है। सिद्धार्थ मल्होत्रा की आगामी फिल्म ‘VVAN – Force of the Forest’ छठ परंपराओं से प्रेरित है, जो 2026 में रिलीज होगी।

चुनौतियां और भविष्य: संरक्षण की आवश्यकता

छठ पूजा को शहरीकरण की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रदूषण से नदियां प्रभावित हो रही हैं, लेकिन सरकार ने 2025 में ‘गंगा सफाई अभियान’ तेज किया है। कोविड के बाद, वर्चुअल छठ ने नई ऊर्जा दी। यूनेस्को ने इसे सांस्कृतिक विरासत मानने पर विचार किया है।

निष्कर्ष: छठ – प्रकाश का पर्व, जीवन का संदेश

Chhath Pooja 2025 बिहार को फिर से रोशन करेगा। यह पर्व सिखाता है – आत्मसंयम, कृतज्ञता और एकता। बिहारी संस्कृति की यह अमूल्य धरोहर न केवल बिहार तक सीमित है, बल्कि वैश्विक पटल पर बिहार की पहचान बना चुकी है। जैसे सूर्य प्रत्येक प्राणी को जीवन देता है, वैसे ही छठ प्रत्येक बिहारी को आशा और शक्ति। आइए, इस महापर्व में डूबें और बिहार की आत्मा को नमन करें। जय छठी मइया!

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