नई दिल्ली | 13 अगस्त 2026: वैवाहिक विवादों और अंतरिम भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए बड़ा निर्णय दिया है, जिसमें केवल पति की आय को आधार बनाकर पत्नी के पक्ष में अंतरिम भरण-पोषण तय कर दिया गया था।
अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट टिप्पणी की है कि कोई भी पत्नी केवल अपने पति की कमाई के भरोसे नहीं बैठ सकती। भरण-पोषण का निर्धारण करते समय केवल पति की वित्तीय स्थिति ही नहीं, बल्कि पत्नी की योग्यता, उसकी कमाने की क्षमता और वित्तीय स्वतंत्रता का भी न्यायसंगत मूल्यांकन किया जाना अनिवार्य है।
फैमिली कोर्ट के फैसले पर हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण पर सवाल उठाए। निचली अदालत ने पति की मासिक आय और व्यापारिक टर्नओवर को मुख्य आधार बनाते हुए भरण-पोषण की एक बड़ी राशि तय कर दी थी।
हाईकोर्ट ने इस आदेश को त्रुटिपूर्ण माना और कहा कि फैमिली कोर्ट ने फैसला सुनाते समय पत्नी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि और उसकी वास्तविक वित्तीय स्थिति की अनदेखी की। अदालत ने कहा कि केवल पति की अच्छी कमाई होना ही अंतरिम राहत का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
भरण-पोषण का मकसद सहारा देना, आर्थिक बोझ बनाना नहीं
अपने फैसले में अदालत ने भरण-पोषण के मूल कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित किया। पीठ ने कहा कि कानून में अंतरिम भरण-पोषण का प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि विवाद के दौरान कोई भी पक्ष वित्तीय तंगी या कंगाली का शिकार न हो।
अदालत ने साफ किया कि भरण-पोषण का उद्देश्य किसी एक पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाना या दूसरे पक्ष पर अत्यधिक आर्थिक बोझ डालना बिल्कुल नहीं है। यदि पत्नी शिक्षित है और स्वयं आजीविका कमाने में सक्षम है, तो उसे पूरी तरह पति की आय पर निर्भर रहने के बजाय खुद भी आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए।
केवल पति की आय पर निर्भरता कानूनी रूप से अनुचित
अदालत ने टिप्पणी की कि अक्सर वैवाहिक मुकदमों में देखा जाता है कि याचिकाकर्ता केवल पति की ऊंची सैलरी या संपत्ति का ब्योरा देकर भारी-भरकम राशि की मांग करते हैं। हाईकोर्ट ने इस परिपाटी को अनुचित ठहराया।
पीठ ने कहा कि जब तक मुख्य याचिका पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक अंतरिम राहत का निर्धारण दोनों पक्षों के संतुलित जीवन स्तर, उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों, आश्रितों के खर्च और पत्नी के अपने वित्तीय साधनों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।
वैवाहिक मुकदमों पर पड़ेगा इस फैसले का गहरा असर
कानूनी मामलों के जानकारों का मानना है कि दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला देश भर की अदालतों में चल रहे भरण-पोषण के मुकदमों के लिए एक नजीर साबित होगा। इससे उन मुकदमों में संतुलन कायम होगा जहाँ बिना गहन जांच-पड़ताल के केवल पति की आय देखकर एकतरफा आदेश पारित कर दिए जाते थे।
इस फैसले के बाद अब फैमिली कोर्ट्स को अंतरिम भरण-पोषण की राशि तय करते समय पति और पत्नी दोनों की वास्तविक वित्तीय स्थिति, योग्यता और व्यावहारिक जरूरतों का पूरा हिसाब-किताब रखना होगा, जिससे दोनों पक्षों को न्याय मिल सके।
Disclaimer: यह रिपोर्ट दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिए गए अदालती फैसले, कानूनी सिद्धांतों और प्राथमिक मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। मामले के पूर्ण कानूनी विवरण के लिए हाईकोर्ट द्वारा जारी आधिकारिक फैसले की प्रति का अवलोकन करें।
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