नई दिल्ली | 13 अगस्त 2026: कथित दिल्ली आबकारी नीति मामले में कानूनी लड़ाई एक बार फिर बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुँच गई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
दोनों शीर्ष नेताओं ने सीबीआई द्वारा उन्हें इस मामले से डिस्चार्ज किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर की गई पुनरीक्षण याचिका का पुरजोर विरोध किया है और अदालत से इसे तुरंत खारिज करने की मांग की है। यह मामला फिलहाल हाईकोर्ट में जस्टिस मनोज जैन की एकल पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए लंबित है, जहाँ दोनों नेताओं ने अपना विस्तृत लिखित जवाब दाखिल कर दिया है।
500 पन्नों का विस्तृत आदेश और 4 घंटे में अपील: जांच एजेंसी की नीयत पर उठे सवाल
इस पूरे अदालती घटनाक्रम में सबसे बड़ा कानूनी बिंदु सीबीआई की हड़बड़ी को लेकर बनाया गया है। केजरीवाल और सिसोदिया की ओर से दाखिल किए गए जवाब में कहा गया है कि विशेष निचली अदालत ने 500 से अधिक पन्नों का अत्यंत विस्तृत, गहन और तथ्यात्मक आरोपमुक्ति आदेश पारित किया था। हालांकि, जांच एजेंसी ने इस विशालकाय अदालती फैसले का अध्ययन किए बिना, महज चार घंटे के भीतर ही इसके खिलाफ हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर दी।
दोनों नेताओं ने अदालत के समक्ष दलील दी है कि इतने कम समय में 500 से अधिक पन्नों के अदालती निष्कर्षों का उचित कानूनी मूल्यांकन करना किसी भी तरह संभव नहीं है। इसे जांच एजेंसी की ‘असाधारण जल्दबाजी’ और ‘कानूनी गंभीरता का घोर अभाव’ करार दिया गया है। याचिका में स्पष्ट कहा गया है कि सीबीआई ने निचली अदालत के निष्कर्षों का विश्लेषण करने के बजाय केवल औपचारिकता पूरी करने और राजनीतिक दबाव में यह कदम उठाया है।
“बिना साक्ष्य और अस्पष्ट याचिका से आरोपियों को हो रहा गंभीर कानूनी नुकसान”
पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व उपमुख्यमंत्री ने अपने जवाब में सीबीआई की इस याचिका को पूरी तरह से अस्पष्ट, व्यापक और आधारहीन बताया है। उन्होंने अदालत के सामने मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु रखे हैं:
- व्यक्तिगत साक्ष्यों की कमी: जांच एजेंसी ने अपनी याचिका में यह कहीं भी अलग-अलग स्पष्ट नहीं किया है कि प्रत्येक आरोपी के संदर्भ में निचली अदालत का फैसला किस आधार पर गलत है या अदालत ने किस साक्ष्य को नजरअंदाज किया है।
- नए तथ्यों का अभाव: सीबीआई ने अपनी इस पुनरीक्षण याचिका के साथ ऐसा कोई भी नया दस्तावेज, साक्ष्य या कानूनी सामग्री पेश नहीं की है, जिससे यह साबित हो सके कि विशेष अदालत का बरी करने का फैसला कानून के विपरीत था।
- बचाव में बाधा: नेताओं का तर्क है कि सीबीआई की इस प्रकार की सामान्य और गैर-विशिष्ट याचिका के कारण बरी हुए व्यक्तियों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि उन्हें अदालत में किस बात का जवाब देना है, जिससे उनके निष्पक्ष सुनवाई के कानूनी अधिकार का हनन हो रहा है।
27 फरवरी का बरी करने का फैसला और सीबीआई की खिंचाई
उल्लेखनीय है कि इसी साल 27 फरवरी को निचली अदालत ने इस बहुचर्चित मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और भारत राष्ट्र समिति की वरिष्ठ नेता के. कविता सहित सभी 23 आरोपियों को भ्रष्टाचार के सभी आरोपों से पूरी तरह मुक्त (बरी) कर दिया था। उस फैसले में विशेष अदालत ने सीबीआई की जांच शैली और साक्ष्यों के अभाव को लेकर जांच एजेंसी को कड़ी फटकार भी लगाई थी। हालांकि, उसी दिन सीबीआई ने आनन-फानन में इस आदेश को चुनौती दे दी थी।
लंबी हिरासत और राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप
यह पूरा मामला देश की राजनीति में काफी गर्माया रहा है। आम आदमी पार्टी शुरुआत से ही केंद्र सरकार पर जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाती रही है। कानूनी लड़ाई के दौरान मनीष सिसोदिया को करीब 530 दिन और अरविंद केजरीवाल को 156 दिन तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा था, जिसके बाद देश की सर्वोच्च अदालत से उन्हें राहत और जमानत मिल पाई थी।
आगे क्या? दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी नजरें
अब इस हाई-प्रोफाइल मामले में दिल्ली हाईकोर्ट को सबसे पहले यह तय करना होगा कि क्या बिना उचित अध्ययन और स्पष्ट साक्ष्यों के 4 घंटे में दाखिल की गई सीबीआई की यह याचिका कानूनी कसौटियों पर सुनवाई के योग्य है या नहीं। हाईकोर्ट का फैसला आने वाले दिनों में इस पूरे मामले की दिशा तय करेगा।
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