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वंदे मातरम् पर कांग्रेस के फैसले के बीच शशि थरूर ने साफ किया रुख, बोले- पार्टी की पुरानी परंपरा आगे भी जारी रहेगी

वंदे मातरम् पर कांग्रेस और बीजेपी की भिड़ंत के बीच शशि थरूर ने पार्टी का रुख साफ कर दिया है। आखिर कांग्रेस 1937 की परंपरा पर क्यों कायम है और राष्ट्रीय कार्यक्रमों को लेकर थरूर ने क्या अलग बात कही?
Khabar Aangan Published on: 23 अगस्त 2026
वंदे मातरम् पर कांग्रेस के फैसले के बीच शशि थरूर ने साफ किया रुख, बोले- पार्टी की पुरानी परंपरा आगे भी जारी रहेगी
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नई दिल्ली, 23 अगस्त 2026: वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पार्टी का रुख स्पष्ट किया है। तिरुवनंतपुरम में उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने पार्टी कार्यक्रमों में लंबे समय से चली आ रही परंपरा के मुताबिक राष्ट्रगान का एक अंतरा और वंदे मातरम् के दो पद गाती रही है और आगे भी यही व्यवस्था जारी रहेगी। थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय या सरकारी कार्यक्रम में जिस गीत का आयोजन हो, उसके अनुसार सभी लोग पूरे सम्मान के साथ खड़े होंगे।

शशि थरूर ने वंदे मातरम् पर क्या कहा?

शशि थरूर ने कहा कि कांग्रेस का रुख इस मामले में स्पष्ट है और पार्टी अपने कार्यक्रमों में पहले से चली आ रही व्यवस्था का पालन कर रही है। उनके मुताबिक कांग्रेस के आयोजनों में राष्ट्रगान का एक अंतरा और वंदे मातरम् के दो पद गाने की परंपरा रही है। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी इस व्यवस्था को अचानक बदलने के बजाय अपनी ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार आगे बढ़ाएगी। उनका बयान ऐसे समय आया है जब इस मुद्दे पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो चुके हैं।

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थरूर ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय या सरकारी कार्यक्रम और राजनीतिक पार्टी का कार्यक्रम एक जैसा नहीं होता। अगर कोई राष्ट्रीय या सरकारी आयोजन है, तो उसमें मौजूद सभी लोग पूरे सम्मान के साथ खड़े होंगे। उनके मुताबिक यह देखना जरूरी है कि कार्यक्रम किस तरह का है और उसमें कौन सा गीत बजाया जा रहा है। इस तरह उन्होंने पार्टी कार्यक्रमों में अपनाई जाने वाली परंपरा और राष्ट्रीय कार्यक्रमों के बीच अंतर को सामने रखा।

1937 के फैसले का क्यों हो रहा है जिक्र?

वंदे मातरम् को लेकर मौजूदा विवाद की जड़ कांग्रेस के 1937 के फैसले से जुड़ी हुई है। एबीपी की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस का कहना है कि उस समय राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को गाने की व्यवस्था तय की गई थी। पार्टी इस फैसले को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और दूसरे नेताओं की सहमति से जुड़ी ऐतिहासिक परंपरा के तौर पर देखती है। यही वजह है कि कांग्रेस अब भी अपने कार्यक्रमों में शुरुआती दो पदों की परंपरा का हवाला दे रही है।

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रिपोर्ट के अनुसार वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों में मातृभूमि की प्रशंसा है, जबकि बाद के हिस्सों में धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख आता है। 1937 में मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम लीग की ओर से इन हिस्सों को लेकर आपत्ति जताई गई थी। इसके बाद कांग्रेस ने राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए शुरुआती दो पदों को अपनाने का फैसला किया था। मौजूदा विवाद में इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर बीजेपी और कांग्रेस की व्याख्याएं अलग-अलग दिखाई दे रही हैं।

BJP और कांग्रेस आमने-सामने क्यों हैं?

वंदे मातरम् विवाद अब सिर्फ गीत गाने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक और राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है। कांग्रेस कार्यसमिति की ओर से 1937 के फैसले को फिर से रेखांकित किए जाने के बाद बीजेपी ने इसकी कड़ी आलोचना की। बीजेपी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस का रुख राष्ट्रीय गीत के सम्मान और उसकी ऐतिहासिक विरासत को सीमित करता है।

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बीजेपी ने 22 अगस्त को वंदे मातरम् की पूरी विरासत और सम्मान के समर्थन में एक प्रस्ताव भी पारित किया। पार्टी ने कांग्रेस के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि राष्ट्रीय गीत की ऐतिहासिक महत्ता से किसी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। इससे पहले गृह मंत्री अमित शाह समेत बीजेपी के कई नेताओं ने कांग्रेस के फैसले पर सवाल उठाए थे। इस पूरे विवाद ने स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रीय प्रतीकों और राजनीतिक परंपराओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

थरूर के बयान से क्या संदेश निकला?

शशि थरूर के ताजा बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि उन्होंने वंदे मातरम् के सम्मान को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई, बल्कि कांग्रेस के कार्यक्रमों में अपनाई जा रही पुरानी व्यवस्था को स्पष्ट किया। उन्होंने यह अंतर भी बताया कि पार्टी कार्यक्रम में क्या परंपरा है और राष्ट्रीय या सरकारी कार्यक्रम में किस तरह सम्मान व्यक्त किया जाएगा। ऐसे में उनका बयान कांग्रेस के मौजूदा रुख को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फिलहाल वंदे मातरम् विवाद के खत्म होने के संकेत नहीं हैं। कांग्रेस अपने 1937 के फैसले को ऐतिहासिक परंपरा बता रही है, जबकि बीजेपी इसे राष्ट्रीय गीत की पूरी विरासत से जोड़कर देख रही है। शशि थरूर के बयान ने पार्टी की स्थिति को जरूर स्पष्ट किया है, लेकिन राजनीतिक बहस अब आगे किस दिशा में जाती है और दोनों दल इस मुद्दे को कितना बड़ा बनाते हैं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।

Disclaimer: यह रिपोर्ट उपलब्ध सार्वजनिक बयानों और विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें राजनीतिक दलों और नेताओं के बयानों को उनके संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है; किसी राजनीतिक आरोप या दावे को स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

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