पटना, 23 अगस्त 2026: पटना हाईकोर्ट ने धार्मिक जुलूस निकालने के अधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि धर्म का पालन और धार्मिक जुलूस निकालना संवैधानिक संरक्षण के दायरे में आता है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह निरंकुश नहीं है। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल सार्वजनिक व्यवस्था, कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य और समाज के अन्य लोगों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए ही किया जा सकता है।
पटना हाईकोर्ट ने किस मामले में दिया फैसला?
मामला बिहार के सीवान जिले के हथौड़ा गांव में होने वाले महाबीरी जुलूस से जुड़ा है। एक श्रद्धालु ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अखाड़ा नंबर-1 के जुलूस में कम से कम 300 श्रद्धालुओं को शामिल होने की अनुमति देने और पुराने पारंपरिक मार्ग से जुलूस निकालने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि इस अखाड़े को वर्ष 1958 से जुलूस निकालने की अनुमति मिलती रही है।
याचिका में बताया गया कि वर्ष 2012 और 2013 में 200 श्रद्धालुओं को जुलूस में शामिल होने की अनुमति थी। इसके बाद 2014 में यह संख्या घटाकर 150 और 2015 में 100 कर दी गई। याचिकाकर्ता के अनुसार, वर्ष 2023 से अनुमति केवल पांच श्रद्धालुओं तक सीमित कर दी गई और पारंपरिक मार्ग में भी बदलाव किया गया। इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए 300 लोगों को शामिल करने की अनुमति मांगी गई थी।
धार्मिक जुलूस के अधिकार पर कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस आलोक कुमार की एकल पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) और अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक गतिविधियों का संरक्षण है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। कोर्ट के अनुसार, धार्मिक जुलूस निकालने का अधिकार भी सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और कानून के अनुरूप उचित प्रतिबंधों के अधीन हो सकता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी धार्मिक गतिविधि का संवैधानिक संरक्षण होने का अर्थ यह नहीं है कि उसके हर तरीके, मार्ग या संख्या को मौलिक अधिकार मान लिया जाए। जुलूस का रास्ता, उसे आयोजित करने का तरीका और उसमें शामिल होने वाले लोगों की संख्या परिस्थितियों के अनुसार प्रशासन द्वारा निर्धारित की जा सकती है, बशर्ते प्रतिबंध कानूनसम्मत और उचित हों।
प्रशासन ने संख्या सीमित करने के पीछे क्या वजह बताई?
राज्य सरकार की ओर से जुलूस में लोगों की संख्या सीमित करने का बचाव कानून-व्यवस्था की स्थिति के आधार पर किया गया। सरकार के अनुसार, अनुमति सीमित संख्या में होने के बावजूद वर्ष 2015 से 2022 के बीच जुलूस के दौरान करीब 1,700 से 2,000 लोगों की भीड़ जमा होती रही। सरकार ने बताया कि इसके बाद कई मामले दर्ज हुए थे।
सरकार ने वर्ष 2024 की एक घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें उसके अनुसार एक सरकारी वाहन में आग लगाने और पुलिसकर्मियों पर पथराव किए जाने की घटना हुई थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन ने जुलूस में शामिल होने वाले लोगों की संख्या और आयोजन से जुड़े अन्य पहलुओं पर प्रतिबंध लगाए थे।
अब जुलूस में कितने लोग शामिल हो सकेंगे?
पटना हाईकोर्ट ने भविष्य में जुलूस में शामिल होने वाले लोगों की संख्या को लेकर 300 की अनुमति देने का आदेश नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि जब भी जुलूस के लिए अनुमति मांगी जाएगी, उस समय की कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए प्रशासन द्वारा संख्या तय की जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आशंका के आधार पर अभी आदेश नहीं दिया जा सकता कि भविष्य में केवल पांच लोगों को अनुमति दी जाएगी।
इस आधार पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार करते हुए उसके इस्तेमाल को सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरे लोगों के अधिकारों के साथ संतुलित रखने की बात कही है।
फैसले का क्या मतलब है?
धार्मिक जुलूस को लेकर पटना हाईकोर्ट का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि धार्मिक स्वतंत्रता संवैधानिक अधिकार है, लेकिन उसके इस्तेमाल पर कानूनसम्मत और उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। खास तौर पर जुलूस की संख्या, मार्ग और आयोजन का तरीका स्थानीय कानून-व्यवस्था तथा परिस्थितियों के आधार पर तय किया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य को सभी धर्मों के प्रति समान और निष्पक्ष रवैया अपनाते हुए सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखनी होगी।
Disclaimer: यह रिपोर्ट उपलब्ध न्यायिक एवं सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार की गई है। न्यायालय के आदेश और संबंधित पक्षों के दावों को उनके संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। किसी पक्ष के आरोप या दावे को स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
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