नई दिल्ली, 31 अगस्त 2026: भारत में मतदाता सूचियों को अपडेट और सत्यापित करने के लिए चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया एक बड़े चरण में पहुंच चुकी है। निर्वाचन आयोग के इस अभियान के दौरान अब तक करीब 6 करोड़ नाम मतदाता सूचियों से हटाए जा चुके हैं। इनमें मृत मतदाताओं, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए लोगों, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत मतदाताओं और अन्य कारणों से हटाए गए नाम शामिल हैं। तीसरे चरण में 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 36.73 करोड़ मतदाताओं की सूची का पुनरीक्षण किया जा रहा है।
बिहार से शुरू हुआ था SIR का अभियान
निर्वाचन आयोग ने SIR की शुरुआत 24 जून 2025 को बिहार से की थी। उस समय विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को दोबारा सत्यापित करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। बिहार में पुनरीक्षण के बाद करीब 65 लाख नाम मतदाता सूची से बाहर हुए। इसको लेकर विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाए और आरोप लगाया कि दस्तावेजों की प्रक्रिया के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम भी प्रभावित हो सकते हैं। आयोग ने लगातार कहा कि उद्देश्य पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल रखना और अपात्र, मृत, स्थानांतरित या दोहरे पंजीकरण वाले नामों को हटाना है।
इसके बाद SIR का दूसरा चरण 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में आगे बढ़ाया गया। इस चरण में पुनरीक्षण से पहले इन क्षेत्रों में कुल मतदाताओं की संख्या 50.99 करोड़ से अधिक थी। अंतिम सूचियां जारी होने के बाद यह संख्या घटकर करीब 45.81 करोड़ रह गई। यानी कुल मतदाता संख्या में 5.18 करोड़ से ज्यादा की कमी आई, जो लगभग 10.2 प्रतिशत है। इनमें 66,88,636 ऐसे मतदाता थे, जिन्हें मृत पाया गया था। उत्तर प्रदेश में मृत मतदाताओं के 25.47 लाख नाम हटे, जबकि पश्चिम बंगाल में यह संख्या 24.16 लाख रही।
तीसरे चरण में 36.73 करोड़ मतदाताओं का पुनरीक्षण
SIR का तीसरा चरण 14 मई 2026 से शुरू किया गया। इस चरण में 16 राज्य और तीन केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं। इन क्षेत्रों में करीब 36.73 करोड़ मतदाताओं की जानकारी का सत्यापन किया जा रहा है। तीसरे चरण में आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, सिक्किम, त्रिपुरा, तेलंगाना और उत्तराखंड के साथ दिल्ली, चंडीगढ़ तथा दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव शामिल हैं।
तीसरे चरण के दौरान कई राज्यों में प्रारंभिक मतदाता सूचियां जारी हो चुकी हैं। जुलाई में ओडिशा, मणिपुर, मिजोरम और सिक्किम की प्रारंभिक सूचियों में ही 22.55 लाख से अधिक नाम हटे थे। इन चार राज्यों में कुल 3.68 करोड़ से अधिक मतदाता थे, जिनमें से करीब 6.12 प्रतिशत नाम प्रारंभिक सूची से बाहर हुए। ओडिशा में सबसे ज्यादा 20.12 लाख नाम हटे, जबकि मणिपुर में 1.58 लाख, मिजोरम में 46,162 और सिक्किम में 37,724 नाम हटाए गए।
किन कारणों से हटाए जा रहे हैं मतदाताओं के नाम
SIR के तहत नाम हटाने के पीछे कई कारण बताए गए हैं। इनमें मतदाता की मृत्यु, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाना और एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होना प्रमुख हैं। ओडिशा के आंकड़ों में ही 10.07 लाख नाम स्थायी रूप से स्थानांतरित होने के कारण हटाए गए, जबकि 8.32 लाख मतदाताओं को मृत पाया गया। करीब 1.58 लाख नाम एक से अधिक जगह पंजीकृत होने के कारण हटाए गए। मणिपुर, मिजोरम और सिक्किम में भी इसी तरह अलग-अलग कारणों से नाम हटाए गए।
हालांकि, SIR केवल नाम हटाने की प्रक्रिया नहीं है। प्रारंभिक सूची जारी होने के बाद मतदाताओं को अपने नाम की जांच करने और किसी गलती की स्थिति में दावा या आपत्ति दर्ज कराने का अवसर भी दिया जाता है। इसी प्रक्रिया के जरिए ऐसे पात्र मतदाता दोबारा सूची में अपना नाम शामिल कराने की मांग कर सकते हैं, जिनका नाम सत्यापन के दौरान किसी कारण से बाहर हो गया हो।
63 लाख से ज्यादा नाम आपत्ति और सुनवाई के बाद हटे
दूसरे चरण के आंकड़ों में यह भी सामने आया कि 63.16 लाख नाम आपत्तियों और संबंधित सुनवाई की प्रक्रिया के बाद हटाए गए। इसका मतलब है कि SIR के दौरान हर नाम को केवल प्रारंभिक सत्यापन के आधार पर अंतिम रूप से हटाया जाना जरूरी नहीं है। कई मामलों में आपत्ति, जांच और निर्णय की प्रक्रिया के बाद नाम हटाने की कार्रवाई की गई। निर्वाचन आयोग इसी प्रक्रिया को मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने के उपाय के रूप में प्रस्तुत करता है।
दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर नाम हटने के कारण राजनीतिक विवाद भी लगातार बना हुआ है। विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने आशंका जताई है कि यदि सत्यापन प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से बाहर हो जाता है तो उसके मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। आयोग का पक्ष इससे अलग है और वह SIR को मतदाता सूची की शुद्धता तथा विश्वसनीयता बढ़ाने की प्रक्रिया बताता है।
सुप्रीम कोर्ट भी दे चुका है SIR की संवैधानिक वैधता पर फैसला
SIR को लेकर कानूनी विवाद भी सामने आया था। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग द्वारा SIR कराने के कदम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। इसके बाद आयोग ने विभिन्न राज्यों में पुनरीक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। हालांकि, मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने की प्रक्रिया से जुड़े अलग-अलग मामलों में दावे, आपत्तियां और कानूनी रास्ते खुले रह सकते हैं।
इस पूरी कवायद का असर आने वाले चुनावों पर भी महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि मतदाता सूची ही यह तय करती है कि कौन व्यक्ति मतदान कर सकेगा। इसलिए SIR के दौरान नाम हटाए जाने के आंकड़ों के साथ-साथ यह देखना भी जरूरी है कि कितने लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई, कितने नाम वापस जोड़े गए और अंतिम मतदाता सूची में कुल कितने मतदाता रहेंगे।
दिल्ली समेत कई राज्यों में प्रक्रिया जारी
तीसरे चरण में शामिल राज्यों में SIR की प्रक्रिया अलग-अलग गति से आगे बढ़ रही है। हाल में दिल्ली की प्रारंभिक मतदाता सूची भी जारी हुई, जिसमें करीब 47.7 लाख नाम मौजूदा सूची से बाहर दिखाई दिए। मतदाताओं को 30 सितंबर तक दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर दिया गया है। इससे साफ है कि प्रारंभिक सूची में नाम का नहीं होना हमेशा अंतिम रूप से मताधिकार खत्म होने के बराबर नहीं माना जा सकता। अंतिम सूची तैयार होने से पहले सुधार की प्रक्रिया उपलब्ध रहती है।
कुल मिलाकर SIR के पहले वर्ष में करीब 6 करोड़ नाम हटने का आंकड़ा इस अभियान के व्यापक स्तर को दिखाता है। जहां निर्वाचन आयोग इसे मतदाता सूची को साफ, अद्यतन और विश्वसनीय बनाने की प्रक्रिया बता रहा है, वहीं बड़े पैमाने पर नाम हटने के कारण राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल भी उठ रहे हैं। तीसरे चरण में 36.73 करोड़ मतदाताओं का सत्यापन पूरा होने और अंतिम सूचियां सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रारंभिक स्तर पर हटाए गए नामों में से कितने नाम अंतिम रूप से बाहर रहते हैं और कितने दावे-आपत्तियों के बाद वापस जोड़े जाते हैं।
Disclaimer – यह खबर निर्वाचन आयोग से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों और सार्वजनिक रूप से सामने आई जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। प्रारंभिक मतदाता सूची में नाम हटना अंतिम रूप से मतदाता सूची से नाम हटने के समान नहीं है, क्योंकि दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया उपलब्ध रहती है। राजनीतिक दलों या अन्य पक्षों द्वारा लगाए गए आरोपों को संबंधित पक्षों के दावे के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है।
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