क्या Meta के स्मार्ट ग्लास से लीक हो रहे लोगों के प्राइवेट पलों के वीडियो? AI ट्रेनिंग के नाम पर स्वीडिश अखबार ने किया चौंकाने वाला खुलासा
क्या आपका स्टाइलिश स्मार्ट चश्मा आपकी जासूसी कर रहा है? एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि एआई ट्रेनिंग के नाम पर लोगों के बाथरूम और बेडरूम के प्राइवेट वीडियो केन्या में बैठे अनजान लोग देख रहे हैं!
नई दिल्ली | 12 मार्च 2026: मार्क जुकरबर्ग की कंपनी Meta और मशहूर चश्मा ब्रांड रे-बैन (Ray-Ban) की पार्टनरशिप में बने ‘स्मार्ट ग्लास’ को भविष्य की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी टेक्नोलॉजी बताया जा रहा है। इन चश्मों को पहनकर लोग खुद को किसी साइंस-फिक्शन फिल्म के जासूस से कम नहीं समझते।
लेकिन इस आधुनिक और स्टाइलिश चश्मे की आड़ में आम लोगों की निजता (Privacy) के साथ एक बहुत बड़ा और खतरनाक खिलवाड़ हो रहा है। स्वीडन के एक प्रमुख अखबार ‘स्वेन्स्का डागब्लाडेट’ (Svenska Dagbladet) ने अपनी हालिया खोजी रिपोर्ट में एक ऐसा सनसनीखेज दावा किया है, जिसने पूरी दुनिया के टेक जगत में हड़कंप मचा दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन स्मार्ट ग्लासेस के जरिए रिकॉर्ड किए गए आम लोगों के बेहद निजी वीडियो क्लिप्स को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सबसे डराने वाली बात यह है कि इन प्राइवेट वीडियो को मशीनें नहीं, बल्कि इंसान अपनी आंखों से देख रहे हैं।
केन्या में बैठे इंसान देख रहे आपके बाथरूम के वीडियो
स्वीडिश अखबार की इस चौंकाने वाली जांच में सामने आया है कि Meta के एआई (AI) मॉडल को ट्रेन करने का एक बड़ा हिस्सा आउटसोर्स किया गया है। यह काम अफ्रीका के केन्या (Kenya) में बैठी ‘सामा’ (Sama) नाम की एक सब-कॉन्ट्रैक्टर कंपनी को सौंपा गया है।
इस कंपनी के कर्मचारियों (ह्यूमन मॉडरेटर्स) का मुख्य काम इन स्मार्ट ग्लासेस द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो फुटेज को ध्यान से देखना और उसमें मौजूद अलग-अलग ऑब्जेक्ट्स (Objects) की पहचान कर उसे टैग करना है।
अखबार को नाम न छापने की शर्त पर कुछ गुमनाम सूत्रों ने बताया है कि इन कर्मचारियों के सामने जो फुटेज आ रहे हैं, वे बेहद आपत्तिजनक हैं। सूत्रों के अनुसार, इन वीडियो क्लिप्स में कई लोग अपने बाथरूम में नजर आ रहे हैं, तो कुछ फुटेज में लोग कपड़े बदलते हुए या अपने जीवन के सबसे निजी पलों में कैद हो गए हैं।
यह इस बात का सीधा और खौफनाक प्रमाण है कि जो चश्मा आप या आपके दोस्त सड़क पर पहनकर घूम रहे हैं, वह अनजाने में आपके बेडरूम तक की संवेदनशील जानकारी किसी विदेशी सर्वर पर भेज रहा है।
रिकॉर्डिंग की LED लाइट और यूजर्स की ‘सहमति’ पर सवाल
रे-बैन और Meta के ये स्मार्ट ग्लास दिखने में बिल्कुल किसी सामान्य और स्टाइलिश सनग्लास (Sunglasses) की तरह ही लगते हैं। लेकिन इन साधारण दिखने वाले चश्मों के फ्रेम के अंदर एक बेहद उच्च क्षमता वाला कैमरा, माइक्रोफोन और स्पीकर बड़ी ही चालाकी से छिपाकर फिट किया गया है।
इनकी मदद से यूजर फोटो-वीडियो रिकॉर्ड कर सकता है, सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीम कर सकता है और वॉयस कमांड देकर एआई असिस्टेंट से तुरंत जानकारी ले सकता है। कंपनी का बचाव में दावा है कि जब भी रिकॉर्डिंग ऑन होती है, तो चश्मे के कोने में एक सफेद एलईडी (LED) लाइट जलने लगती है।
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लेकिन साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और निजता के पैरोकारों का स्पष्ट रूप से कहना है कि दिन की तेज रोशनी में या भारी भीड़-भाड़ वाले इलाकों में इस छोटी सी लाइट को देख पाना लगभग असंभव है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यूजर्स को इस बात की पूरी और पारदर्शी जानकारी थी कि उनके द्वारा मजे-मजे में रिकॉर्ड किए गए डेटा को केन्या में बैठे अनजान लोग अपनी स्क्रीन पर देख रहे हैं? डेटा उपयोग और ‘स्पष्ट सहमति’ (Explicit Consent) को लेकर यह बहस अब पूरी दुनिया में तेज हो गई है।
AI को ‘इंसान’ बनाने की होड़ और डेटा की भूख
आज के समय में पूरी दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां अपने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम को ज्यादा से ज्यादा स्मार्ट बनाने की अंधी दौड़ में शामिल हैं। किसी भी एआई को इंसानों की तरह सोचने लायक बनाने के लिए उसे ‘रियल-वर्ल्ड डेटा’ (Real-world Data) के एक विशाल भंडार की जरूरत होती है।
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Meta के ये स्मार्ट ग्लास इसी रियल-वर्ल्ड डेटा को जुटाने का सबसे आसान, सस्ता और चलता-फिरता हथियार बन गए हैं। लेकिन विशेषज्ञों ने इस अंधी दौड़ से पैदा होने वाले कई गंभीर खतरों को चिन्हित किया है:
चेहरा पहचानने का खतरा (Facial Recognition): इन ग्लासेस के लगातार इस्तेमाल से सड़क पर चलते किसी भी अनजान व्यक्ति का चेहरा बिना उसकी इजाजत के रिकॉर्ड हो रहा है, जिसका भविष्य में गलत इस्तेमाल किया जा सकता है।
निगरानी तंत्र (Surveillance): प्राइवेसी एक्टिविस्ट्स का मानना है कि यह तकनीक जाने-अनजाने में एक ऐसा ग्लोबल सर्विलांस (निगरानी) नेटवर्क बना रही है, जहां हर आम इंसान अनजाने में एक ‘सीसीटीवी कैमरा’ बन गया है।
तकनीक आगे, लेकिन कानून बहुत पीछे
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर इस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है कि नई और क्रांतिकारी तकनीक जितनी तेजी से बाजार में आ रही है, हमारे प्राइवेसी कानून (Privacy Laws) उससे कहीं ज्यादा पीछे छूट गए हैं।
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जब तक कोई नया कानून ड्राफ्ट होता है, तब तक टेक कंपनियां एक नया डिवाइस लॉन्च करके लोगों के घरों में घुस चुकी होती हैं। यूरोपियन यूनियन के सख्त ‘जीडीपीआर’ (GDPR) नियमों के बावजूद अगर किसी स्वीडिश अखबार को इस तरह के डेटा लीक का पर्दाफाश करना पड़ रहा है, तो यह सिस्टम की एक बहुत बड़ी नाकामी है।
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फिलहाल Meta की ओर से इस विशिष्ट रिपोर्ट और केन्या में बैठे ‘ह्यूमन मॉडरेटर्स’ द्वारा प्राइवेट वीडियो देखे जाने के सनसनीखेज दावों पर कोई सीधा और स्पष्ट आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
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