‘आश्रम’ और ‘राजनीति’ जैसी शानदार सौगात देने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक प्रकाश झा ने एक बार फिर भारतीय राजनीति की काली सच्चाई को पर्दे पर उतारा है। यह सीरीज विशेष रूप से इसलिए भी भारी चर्चा में है क्योंकि इसके जरिए दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर ने ओटीटी (OTT) की दुनिया में अपना धमाकेदार डेब्यू किया है।
इस वेब सीरीज की पूरी कहानी प्राचीन भारत के चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य के ऐतिहासिक वृत्तांत से प्रेरित है। लेकिन इसे आधुनिक भारत के राजनीतिक परिदृश्य और नौकरशाही में बड़ी ही चतुराई और गंभीरता के साथ बुना गया है। इस कहानी में रणभूमि की जगह बंद कमरों में होने वाली गुप्त राजनीतिक बैठकों ने ले ली है।
नाना पाटेकर ने इस सीरीज में ‘माट साब’ (कन्हैयालाल) का एक बेहद शक्तिशाली और रहस्यमयी किरदार निभाया है। वह एक ऐसा मास्टर-माइंड और राजनीतिक रणनीतिकार है, जो कोई चुनाव लड़े बिना पर्दे के पीछे से पूरी सरकार और व्यवस्था को अपने इशारों पर नचाता है।
कहानी में असली मोड़ तब आता है जब माट साब का सबसे वफादार और होनहार शिष्य आदित्य वर्मा (मोहम्मद जीशान अय्यूब) अपने गुरु की तानाशाही के खिलाफ बगावत कर देता है। गुरु और शिष्य की यह वैचारिक और राजनीतिक जंग दर्शकों को अंत तक बांधे रखने का प्रयास करती है।
प्रकाश झा बॉलीवुड के उन गिने-चुने फिल्मकारों में से हैं जो ‘मास-अपीलिंग’ (Mass-appealing) और जमीनी कहानियां कहने में माहिर हैं। ओटीटी के इस आधुनिक दौर में जहां ज्यादातर शोज़ एक खास ‘एलीट’ वर्ग को ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं, वहीं झा सीधे आम जनता के मुद्दों से जुड़ते हैं।
‘आश्रम’ की तरह ही इस सीरीज में भी समाज की उन छिपी हुई बुराइयों और सत्ता के लालच को बेनकाब किया गया है, जिन्हें आम तौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है। शिक्षा, राजनीति और भ्रष्टाचार का जो ताना-बाना उन्होंने इस कहानी में बुना है, वह डराने के साथ-साथ हमें सोचने पर भी मजबूर करता है।
अभिनय: नाना पाटेकर और जीशान अय्यूब की दमदार टक्कर
अभिनय के मोर्चे पर यह पूरी सीरीज नाना पाटेकर के मजबूत कंधों पर टिकी हुई है। उनके संवाद बोलने का अनोखा अंदाज, रहस्यमयी खामोशी और सिर्फ आंखों से खौफ पैदा करने की कला इस सीरीज की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) है। उनका यह किरदार लंबे समय तक दर्शकों के जेहन में ताजा रहेगा।
मोहम्मद जीशान अय्यूब ने एक महत्वाकांक्षी और विद्रोही शिष्य के रूप में अपने किरदार में जान फूंक दी है। जब भी स्क्रीन पर नाना पाटेकर और जीशान अय्यूब का वैचारिक आमना-सामना होता है, तो वह दृश्य कहानी का सबसे मजबूत और तनावपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
सीरीज में राज्य के मुख्यमंत्री प्रशांत सिंह के रूप में अभिनेता संजय कपूर ने भी अपना काम बहुत ही संजीदगी से किया है। वहीं, नीरज काबी (वकार साब), कुब्रा सैत और क्रांति प्रकाश झा जैसे मंझे हुए कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है।
निर्देशन, संवाद और तकनीकी पक्ष
प्रकाश झा का निर्देशन हमेशा की तरह जमीनी और यथार्थवादी (Realistic) है। उन्होंने सत्ता, वफादारी और विचारधारा के त्रिकोण को बहुत ही बारीकी से पर्दे पर उतारा है। सीरीज का प्रोडक्शन डिजाइन और सिनेमैटोग्राफी कहानी के डार्क और गंभीर टोन के बिल्कुल अनुकूल है।
चंदन कुमार द्वारा लिखे गए संवाद (Dialogues) बेहद तीखे, दार्शनिक और सीधे वार करने वाले हैं। बैकग्राउंड स्कोर (वेन शार्प) राजनीतिक तनाव को बढ़ाने में काफी मदद करता है। यह एक बिना गानों वाली सीरीज है, जो शुरू से लेकर अंत तक अपनी गंभीरता को बनाए रखती है।
सीरीज की सबसे बड़ी कमजोरी: उबाऊ लंबाई
इतनी शानदार स्टारकास्ट और मजबूत कहानी होने के बावजूद, यह Sankalp Series अपनी अत्यधिक लंबाई (Runtime) के कारण मात खा जाती है। यह पूरी सीरीज लगभग 7 घंटे 50 मिनट लंबी है, और इसका केवल अंतिम एपिसोड ही 63 मिनट का है।
शुरुआती एपिसोड्स में जो रोमांच और तेज रफ्तार देखने को मिलती है, वह बीच के हिस्सों में आते-आते काफी सुस्त पड़ जाती है। कुछ ट्रैक और सब-प्लॉट (जैसे कुब्रा सैत का नकली नोटों वाला एंगल) मुख्य कहानी से भटकते हुए महसूस होते हैं।
आपका छोटा सा सहयोग हमारी पत्रकारिता को नई मजबूती देता है।
एडिटिंग टेबल पर अगर इसे थोड़ा और क्रिस्प (Crisp) और चुस्त रखा जाता, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ सकता था। इसके अलावा, जिस तूफानी और विस्फोटक क्लाइमैक्स (Climax) की उम्मीद दर्शक कर रहे होते हैं, वह अंततः थोड़ा फीका और कमजोर साबित होता है।
हमारा निष्कर्ष
प्रकाश झा की यह नई पेशकश भारतीय राजनीति के पर्दे के पीछे चलने वाले उस अदृश्य खेल को बेनकाब करती है, जहां नैतिकता और रिश्तों की कोई जगह नहीं होती। नाना पाटेकर का डरावना अभिनय और जीशान अय्यूब के साथ उनकी वैचारिक टक्कर इसे एक ‘मस्ट-वॉच’ (Must-watch) राजनीतिक थ्रिलर बनाती है।
हालांकि, सीरीज की धीमी रफ्तार और लगभग 8 घंटे की उबाऊ लंबाई आपके धैर्य की कड़ी परीक्षा जरूर लेगी। अगर आप गंभीर राजनीतिक ड्रामे और शानदार डायलॉग-बाजी के शौकीन हैं, तो आप इस वीकेंड अमेज़ॅन एमएक्स प्लेयर पर इस सीरीज को अपना समय दे सकते हैं।