विटामिन D शरीर में कैल्शियम एवं फॉस्फोरस के संतुलन और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक तत्व है। हाल के वर्षों में भारत समेत पूरी दुनिया में विटामिन D की कमी एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन गई है। शोध के अनुसार, भारत में हर पांच में से एक व्यक्ति इस कमी से पीड़ित है, जिसके गंभीर दुष्प्रभाव बच्चों, युवाओं, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों में देखे जा रहे हैं।
विटामिन D एक विटामिन नहीं बल्कि एक हार्मोन जैसा कार्य करने वाला पोषक तत्त्व माना जाता है। शरीर में इसका मुख्य परीक्षण serum 25-hydroxyvitamin D या 25(OH)D से किया जाता है — सामान्यत: 20 ng/mL (50 nmol/L) के ऊपर को पर्याप्त माना जाता है, और 12 ng/mL (30 nmol/L) से नीचे गंभीर कमी का संकेत हो सकता है; अलग-अलग मार्गदर्शिकाएँ थोड़ी भिन्न संख्याएँ देती हैं, इसलिए चिकित्सक से सलाह ज़रूरी है।
विटामिन D शरीर में कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है, जो हड्डियों, मांसपेशियों, दाँत और इम्यून सिस्टम के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। इसकी कमी का सबसे पहला असर कमजोर हड्डियों एवं मांसपेशियों के रूप में सामने आता है।
2025 में जारी ताजा रिपोर्टों के अनुसार, 46% भारतीयों में विटामिन D की कमी पाई गई; दक्षिण भारत में यह आंकड़ा 51.6% तक है, वहीं दिल्ली समेत शहरी क्षेत्रों में भी आंकड़ा चिंता जनक है।
•किशोर एवं युवाओं में सबसे अधिक कमी
•केवल 8-14% भारतीय ही पर्याप्त मात्रा में डेयरी उत्पाद लेते हैं
•करीब 30% लोग शुद्ध शाकाहारी हैं, जिससे फूड सोर्स कम हो जाता है
Vitamin D deficiency के मुख्य कारण
•शहरीकरण से कम धूप में समय बिताना
•वायु प्रदूषण से सूर्य की रोशनी बाधित होना
•घर के अंदर अधिक समय रहना
•पर्याप्त मात्रा में विटामिन D युक्त भोजन न लेना (फिश, एग, डेयरी)
•डेयरी असहिष्णुता या खान-पान संबंधी संस्कृति
•पर्याप्त विटामिन D फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों की कमी
•व्यक्तिगत लाइफस्टाइल बदलाव, स्क्रीन टाइम बढ़ना
Vitamin D deficiency के लक्षण
कई बार यह कमी बिना लक्षण के रहती है, लेकिन लंबे समय तक गंभीरता बढ़ने पर निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं।
•लगातर थकान, कमजोरी
•मांसपेशियों एवं जोड़ में दर्द
•मूड में चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, चिंता(Anxiety)
•बालों का झड़ना
•भूख न लगना या वजन घटाना
•बार-बार बीमार पड़ना
•हड्डियों में दर्द, टूटने का डर
•बच्चों में चिड़चिड़ापन, विकास में रुकावट, रिकेट्स
•घाव भरने में देर
•इम्यूनिटी कम होना
Vitamin D deficiency से संबंधित रोग
•ऑस्टियोमलेशिया (हड्डियां मुलायम होती हैं)
•ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियाँ कमजोर होकर जल्दी टूटती हैं)
•बच्चों में रिकेट्स (हड्डियों का टेढ़ापन)
•पुरानी थकान-डिप्रेशन
•दिल की बीमारी, डायबिटीज़, कैंसर के जोखिम में वृद्धि
•संक्रमण की संभावना अधिक होना
सबसे प्रभावित समूह
भारत में Vitamin D deficiency से सबसे अधिक प्रभावित समूह हैं:
•बच्चे
•किशोर
•गर्भवती महिलाएँ
•बुजुर्ग
•शुद्ध शाकाहारी
•शहरी और उच्च वर्ग के लोग (कम सूर्य संपर्क)
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इलाज एवं बचाव के उपाय
धूप में समय बिताएँ
प्राकृतिक रूप से विटामिन D प्राप्त करने का सबसे अच्छा जरिया सूर्य की रोशनी है। विशेषज्ञों के अनुसार, सुबह के समय प्रतिदिन 30–45 मिनट बिना सनस्क्रीन के बाहों एवं पैरों को सूर्य किरणों के संपर्क में लाना चाहिए।
विटामिन D युक्त आहार
विटामिन D मुख्यतः इन खाद्य पदार्थों में मिलता है:
•वसायुक्त मछली (सैल्मन, सार्डिन)
•अंडे की जर्दी
•फोर्टिफाइड दूध और डेयरी
•मशरूमफोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ (सीरियल, ऑरेन्ज जूस)
सप्लिमेंटेशन
जब आहार एवं सूर्य संपर्क संभव न हो, तो डॉक्टर की सलाह पर 1000 से 2000 IU प्रतिदिन सप्लिमेंट लेना सुरक्षित रहता है।
सुरक्षा के लिए विटामिन D का ब्लड टेस्ट अवश्य कराना चाहिए।
विशेष सलाह
•बचपन से बुजुर्ग तक सभी को नियमित जांच करानी चाहिए
•जोखिम समूह (गर्भवती महिलाएं, बच्चें, बुजुर्ग, शाकाहारी) को सप्लिमेंट की आवश्यकता अधिक हो सकती है
•बिना सलाह अत्यधिक डोज़ नहीं ले
सुरक्षा — अधिकता (Toxicity) से बचें
बहुत अधिक विटामिन D लेने से हाइपरकैल्सीमिया (रक्त में कैल्शियम का बढ़ना), किडनी पर असर और अन्य जटिलताएँ हो सकती हैं। वयस्कों के लिए सुरक्षित ऊपरी सीमा सामान्यतः 4000 IU/दिन (100 µg) मानी जाती है; अत्यधिक और अननियंत्रित सप्लीमेंट लेने से बचें।
भारत सरकार की पहल
सरकारी स्तर पर जागरूकता बढ़ाने, सुरक्षित फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने और नियमित स्क्रीनिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
निष्कर्ष
Vitamin D deficiency एक व्यापक, परन्तु रोकने और इलाज करने योग्य समस्या है। समय पर पहचान, वैज्ञानिक रूप से संचालित टेस्टिंग और सुरक्षित उपचार — ये तीनों मिलकर व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बड़े लाभ ला सकते हैं। अपने डॉक्टर से सलाह लेकर सही परीक्षण और जरूरत के मुताबिक जीवनशैली/आहार/सप्लीमेंट रणनीति अपनाएँ — और बिना परामर्श के अत्यधिक खुराक से बचें।