दरभंगा, 3 सितंबर 2026: कभी ‘तालाबों का शहर’ कहे जाने वाले दरभंगा में अब बचे हुए जलस्रोतों को बचाने की लड़ाई अदालत तक पहुंच गई है। शहर के ऐतिहासिक हराही, दिग्घी और गंगासागर पोखरों को लेकर स्थानीय नागरिक समूह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विवाद केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि इन पुराने जलस्रोतों का संरक्षण किया जाए या उनके ‘सौंदर्यीकरण’ के नाम पर ऐसा निर्माण हो, जिससे उनकी प्राकृतिक भूमिका प्रभावित हो सकती है।
दरभंगा की पहचान कभी उसके पोखरों से होती थी। 1969 के जिला गजेटियर में शहर में 350 से अधिक पोखरों का उल्लेख मिलता है, लेकिन अब इनकी संख्या 100 से भी कम बताई जा रही है। इसी के साथ भूजल स्तर में गिरावट और गर्मियों में पानी की परेशानी जैसी चुनौतियां भी सामने आती रही हैं। ऐसे में स्थानीय लोगों का कहना है कि बचे हुए पोखरों को सिर्फ सुंदर बनाने के बजाय उनके जल-संग्रह और प्राकृतिक स्वरूप को बचाना ज्यादा जरूरी है।
हराही, दिग्घी और गंगासागर पर टिकी पूरी बहस
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला दरभंगा शहर के तीन प्रमुख और आपस में जुड़े जलाशयों हराही, दिग्घी और गंगासागर से संबंधित है। ये पोखर लंबे समय से शहर की भौगोलिक और सामाजिक पहचान का हिस्सा रहे हैं। स्थानीय नागरिक समूह तालाब बचाओ अभियान ने इन जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्स्थापना की मांग करते हुए याचिका दायर की है। संगठन का कहना है कि इन जलस्रोतों को उनके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखने की जरूरत है।
मामले में बिहार सरकार की ओर से इन पोखरों के पुनर्जीवन और सौंदर्यीकरण के लिए करीब 70.34 करोड़ रुपये की योजना का भी जिक्र सामने आया है। यह परियोजना करीब 1.8 किलोमीटर क्षेत्र में आपस में जुड़े इन तीनों पोखरों को कवर करती है। विवाद इस बात को लेकर गहराया कि जलाशयों का संरक्षण किस तरीके से किया जाए और विकास कार्यों के दौरान उनके प्राकृतिक जल-चरित्र में कोई ऐसा बदलाव न आए, जिससे भविष्य में उनकी उपयोगिता प्रभावित हो।
सौंदर्यीकरण या असली संरक्षण, यही है विवाद की जड़
स्थानीय नागरिकों की आपत्ति का एक बड़ा हिस्सा ‘सौंदर्यीकरण’ की उस प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसे वे जलस्रोतों के वास्तविक संरक्षण से अलग मानते हैं। तालाब बचाओ अभियान की ओर से आरोप लगाया गया है कि परियोजना के दौरान मिट्टी डाले जाने और निर्माण गतिविधियों से पोखरों की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो सकती है। संगठन ने इसी आधार पर पुनर्स्थापना और संरक्षण को प्राथमिकता देने की मांग की है।
यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शहर के तालाब केवल पानी जमा करने वाली जगह नहीं होते। वे बारिश के पानी को रोकने, भूजल के पुनर्भरण और शहरी बाढ़ के प्रभाव को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी इस तरह के जलस्रोतों को प्राकृतिक जल-संग्रह प्रणाली का हिस्सा माना है। तालाबों के भरने या उनके स्वरूप में बदलाव से भूजल पुनर्भरण की क्षमता पर असर पड़ने की आशंका जताई जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद रुका काम
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद तीनों पोखरों में चल रहे सौंदर्यीकरण कार्य को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप हुआ। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार 28 जुलाई को बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मौखिक रूप से आश्वासन दिया कि तीनों पोखरों में आगे मिट्टी नहीं डाली जाएगी और सौंदर्यीकरण का काम रोका जाएगा। इसके बाद इस परियोजना को लेकर आगे की न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार है।
इससे पहले भी दरभंगा के जलस्रोतों और अतिक्रमण को लेकर न्यायिक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। जनवरी 2024 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष दरभंगा के एक सरकारी तालाब को मिट्टी से भरने और उस पर निर्माण किए जाने की शिकायत का मामला आया था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने Hinch Lal Tiwari बनाम Kamala Devi फैसले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें प्राकृतिक तालाबों को भरने या अतिक्रमण से बचाने और उन्हें मूल स्वरूप में बनाए रखने की जिम्मेदारी पर जोर दिया गया था।
350 से ज्यादा पोखरों वाला शहर अब पानी को तरस रहा
दरभंगा की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है। जिस शहर की पहचान कभी सैकड़ों पोखरों से होती थी, वहां अब 100 से भी कम जलस्रोत बचे होने की बात सामने आ रही है। तालाबों के कम होने के साथ शहरीकरण का दबाव बढ़ा है और बचे हुए जलस्रोतों के आसपास भी अतिक्रमण की शिकायतें सामने आती रही हैं। स्थानीय नागरिक समूहों का आरोप है कि कई जगह जलस्रोतों को भरकर घर, होटल, अस्पताल और कोचिंग संस्थानों जैसे निर्माण किए गए हैं।
हालांकि किसी विशेष पोखर पर अतिक्रमण या अवैध निर्माण का आरोप संबंधित रिकॉर्ड और सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्ष के आधार पर ही तय किया जा सकता है। लेकिन व्यापक तस्वीर यह बताती है कि शहर के पुराने जलस्रोतों का संरक्षण अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया है। यह भूजल, जलभराव, शहरी नियोजन और आने वाले वर्षों में शहर की पानी की जरूरतों से भी सीधे जुड़ता जा रहा है।
नागरिकों की लड़ाई अब अदालत में
तालाब बचाओ अभियान वर्ष 2012 से इन जलस्रोतों के संरक्षण को लेकर सक्रिय होने का दावा करता है। संगठन के सदस्यों ने प्रदर्शन, जागरूकता अभियान और कानूनी कार्रवाई के जरिए पोखरों की स्थिति को सार्वजनिक मुद्दा बनाया है। अब सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के जरिए मांग यह है कि ऐतिहासिक जलस्रोतों को केवल निर्माण आधारित ‘सुंदर’ बनाने के बजाय उनकी प्राकृतिक क्षमता और मूल स्वरूप को बहाल किया जाए।
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बने। शहर को बेहतर सार्वजनिक स्थान, साफ-सफाई और सुविधाएं मिलें, यह जरूरी है; लेकिन इसके लिए सदियों पुराने जलस्रोतों की जलधारण क्षमता और प्राकृतिक स्वरूप से समझौता न हो, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। दरभंगा के इन तीन पोखरों पर चल रही कानूनी लड़ाई इसी बड़े सवाल का जवाब तलाश रही है।
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