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मानवीय आधार पर कैदियों की रिहाई: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, राज्यों को 3 महीने में नीति बनाने का निर्देश

बुजुर्ग और बीमार कैदियों को मिलेगी बड़ी राहत! सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे 3 महीने के भीतर 'समय से पहले रिहाई' के लिए एक स्पष्ट नीति तैयार करें और ई-प्रिजन्स पोर्टल का उपयोग करें।
Khabar Aangan Published on: 16 जुलाई 2026
मानवीय आधार पर कैदियों की रिहाई: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, राज्यों को 3 महीने में नीति बनाने का निर्देश
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नई दिल्ली | 16 जुलाई 2026: देश की सर्वोच्च अदालत ने जेलों में बंद बुजुर्ग, गंभीर रूप से बीमार और शारीरिक रूप से अक्षम कैदियों की रिहाई के लिए एक बड़ा और क्रांतिकारी आदेश जारी किया है। खबर आंगन की लीगल डेस्क के अनुसार, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर एक ‘स्पष्ट और मानवीय रिहाई नीति’ तैयार करने का सख्त निर्देश दिया है।

संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हवाला देते हुए मांगी राहत

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने माना कि जेलों में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बुजुर्गों और गंभीर बीमार कैदियों को रखना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता) का सीधा उल्लंघन है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप, अदालत ने इन कैदियों की दयापूर्ण रिहाई की आवश्यकता पर बल दिया है।

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नीति में स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड और स्पष्ट पात्रता शर्तें अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्यों द्वारा बनाई जाने वाली नई नीति में ‘लाइलाज बीमारी’ की स्पष्ट परिभाषा दी जाए। इसके साथ ही, किसी भी कैदी की स्थिति की निष्पक्ष जांच के लिए एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड का गठन अनिवार्य होगा। अदालत ने साफ किया है कि रिहाई के लिए आने वाले आवेदनों का निपटारा बिना किसी अनावश्यक देरी के पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए।

‘ई-प्रिजन्स पोर्टल’ के जरिए डिजिटल होगी पूरी प्रक्रिया

न्यायालय ने प्रक्रिया को भ्रष्टाचार मुक्त और समयबद्ध बनाने के लिए ‘ई-प्रिजन्स पोर्टल’ का उपयोग अनिवार्य कर दिया है। अब आवेदन दाखिल करने से लेकर मेडिकल रिपोर्ट, जेल अधिकारियों की सिफारिश और सक्षम प्राधिकारी के अंतिम निर्णय तक की पूरी प्रक्रिया डिजिटल होगी। पोर्टल में डेडलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम और ऑटोमैटिक अलर्ट की सुविधा भी उपलब्ध होगी ताकि किसी भी स्तर पर फाइल न अटके।

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केंद्र सरकार और एनआईसी (NIC) को तकनीकी सहयोग का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को धरातल पर उतारने के लिए कानून मंत्रालय, गृह मंत्रालय और एनआईसी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। एनआईसी को ई-प्रिजन्स पोर्टल को अपग्रेड करने और राज्यों को सॉफ्टवेयर व प्रशिक्षण की सुविधा देने को कहा गया है। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कैदियों की मेडिकल और निजी जानकारी पूरी तरह से गोपनीय और सुरक्षित रहे।

6 महीने में दाखिल करना होगा अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit)

अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छह महीने के भीतर इस आदेश के पालन का हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। इस रिपोर्ट में नई नीति की स्थिति, रिहाई के लिए चिह्नित किए गए कैदियों की संख्या और विचाराधीन मामलों का संपूर्ण विवरण अनिवार्य रूप से देना होगा। यह कदम न्यायिक और प्रशासनिक जवाबदेही को और भी अधिक मजबूत करेगा।

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हमारा निष्कर्ष

हमारा स्पष्ट निष्कर्ष है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश जेल सुधारों की दिशा में एक अत्यंत प्रगतिशील कदम है। यह आदेश न केवल कैदियों के बुनियादी मानवीय अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि जेलों पर पड़ने वाले अनावश्यक बोझ को कम कर न्याय प्रणाली में भी नई पारदर्शिता लाएगा। कानून और न्याय जगत से जुड़ी हर पक्की खबर के लिए हमेशा ‘खबर आंगन’ के साथ जुड़े रहें।

Disclaimer: यह रिपोर्ट माननीय सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों और संबंधित कानूनी दस्तावेजों के आधार पर तैयार की गई है। कैदियों की रिहाई के संबंध में सटीक पात्रता और प्रक्रियाओं के लिए कृपया अपने राज्य के कारागार विभाग की आधिकारिक अधिसूचना का ही अवलोकन करें।

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