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Tribal Art की नई जागृति: भारत की हस्तकलाओं का अंतरराष्ट्रीय विस्तार”

"भारत की जनजातीय कला अब सीमाओं से परे उड़ान भर रही है। वारली, मधुबनी, गोंड और कलमकारी जैसी हस्तकलाएं न सिर्फ सांस्कृतिक पहचान हैं, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की रचनात्मक शक्ति का प्रतीक बन चुकी हैं। जानिए कैसे आदिवासी कलाकार अपनी विरासत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला रहे हैं।"
Ravi Prakash Jha Published on: 20 अक्टूबर 2025
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भारत में Tribal Art और हस्तकला का नया युग शुरू हो चुका है — एक ऐसा दौर जिसमें परंपरा और वैश्वीकरण का संगम हमारे कारीगरों और कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला रहा है। “ट्राइबल आर्ट की नई जागृति: भारत की हस्तकलाओं का अंतरराष्ट्रीय विस्तार” विषय पर यह लेख इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण की गहराई को समझाता है।

भारत की Tribal Art का पुनर्जागरण:-

2025 में भारत भर में आयोजित कई प्रमुख आयोजनों ने Tribal Art की पुनर्स्थापना में अहम भूमिका निभाई। दिल्ली में आयोजित “साइलेंट कन्वर्सेशन” ट्राइबल आर्ट एग्ज़िबिशन में 17 राज्यों के 50 से अधिक कलाकारों ने अपनी 250 कलाकृतियां प्रदर्शित कीं, जिनमें गोंड, वारली, सौरा जैसी कला शैलियाँ शामिल थीं। इसी तरह, “आदि महोत्सव 2025” में 600 से अधिक जनजातीय कारीगरों और 500 कलाकारों ने भाग लिया। इन आयोजनों ने देश के साथ-साथ विदेशों में भी भारतीय कला की पहचान को सशक्त बनाया।

कला और संरक्षण का संगम:-

ट्राइबल आर्ट और पर्यावरण संरक्षण का गहरा संबंध देखने को मिला। “ट्राइबल आर्ट्स एंड इंडिया’स कंज़र्वेशन एथोस” नामक राष्ट्रीय सम्मेलन में नीति विशेषज्ञों और कलाकारों ने चर्चा की कि कैसे पारंपरिक जनजातीय कलाएं पर्यावरणीय संतुलन और जैव विविधता की रक्षा में सहायक हैं। इस पहल का उद्देश्य था कि जनजातीय समुदायों को वनों पर निर्भरता घटाने के साथ वैकल्पिक आजीविका प्रदान की जाए।

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वैश्विक मंच पर भारतीय हस्तकलाएँ:-

भारतीय हस्तकला बाजार की वैश्विक स्थिति अभूतपूर्व है। 2025 में यह बाजार लगभग 100 अरब अमेरिकी डॉलर के मूल्य तक पहुँच चुका है और सालाना 10% की दर से बढ़ रहा है। अमेरिकी, जर्मन और ऑस्ट्रेलियाई बाजारों में भारतीय लकड़ी की नक्काशी, धातु कला, वस्त्रकारी और मिट्टी की कलाकृतियों की भारी मांग है। अब इन कलाओं को ऑनलाइन मार्केटप्लेस जैसे अंतरराष्ट्रीय ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म्स पर भी प्रमोट किया जा रहा है, जिससे जनजातीय कलाकार सीधे विश्व उपभोक्ताओं से जुड़ पा रहे हैं।

डिजिटल माध्यमों का योगदान:-

डिजिटल तकनीक ने इस नई जागृति में अहम भूमिका निभाई है। अब कलाकार पारंपरिक मेलों पर निर्भर नहीं हैं — सोशल मीडिया, ऑनलाइन प्रदर्शनियां और वर्चुअल ट्रेड फेयर के माध्यम से उनकी कृतियाँ अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तक पहुँची हैं। उदाहरण के लिए, Truly Tribal जैसी संस्थाएँ वारली और पिचवाई जैसी कलाओं को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर पुनर्जीवित कर रही हैं।

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