पटना, 23 अगस्त 2026: बिहार भाजपा अध्यक्ष संजय सरावगी ने वंदे मातरम् का सम्मान करने को देश की आजादी, राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से जुड़ा विषय बताया है। शनिवार को पटना में भाजपा के नवनियुक्त पदाधिकारियों की पहली बैठक में वंदे मातरम् की गरिमा और विरासत को संरक्षित करने से संबंधित प्रस्ताव पारित होने के बाद सरावगी ने कहा कि इसे वोट बैंक की राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
वंदे मातरम् को वोट बैंक की राजनीति से जोड़ने पर आपत्ति
संजय सरावगी ने कहा कि वंदे मातरम् केवल एक राष्ट्रीय गीत नहीं है, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की ऐसी विरासत है, जिसने लाखों देशवासियों और क्रांतिकारियों को मातृभूमि के लिए समर्पित होने की प्रेरणा दी। उनके मुताबिक इसके ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व को किसी राजनीतिक दल के वोट बैंक के हिसाब से नहीं तौला जाना चाहिए। उन्होंने इसे देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रभक्ति से जुड़ा प्रतीक बताया।
भाजपा नेता ने कहा कि वंदे मातरम् किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है और न ही इसे किसी खास वर्ग या समुदाय तक सीमित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस गीत ने लोगों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसलिए वंदे मातरम् का सम्मान केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं, बल्कि देश के इतिहास और स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े योगदान को याद करने का भी विषय है।
कांग्रेस के प्रस्ताव पर सरावगी ने उठाए सवाल
सरावगी ने 19 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति की ओर से वंदे मातरम् को लेकर लिए गए फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस इस विषय को ऐसे तरीके से राजनीतिक रूप दे रही है, जिससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होने के बजाय विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि कांग्रेस के रुख को लेकर लगाए गए ये आरोप सरावगी की राजनीतिक प्रतिक्रिया हैं और इन्हें उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
बिहार भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था है और देश का शासन संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के आधार पर चलता है, किसी राजनीतिक दल के प्रस्ताव के आधार पर नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन किसी को जानबूझकर इसके गायन में बाधा डालने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए।
15 अगस्त की घटना का भी किया जिक्र
संजय सरावगी ने 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन के दौरान हुई कथित घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस घटनाक्रम ने कांग्रेस के रुख को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले ने उनकी चिंता को और बढ़ाया। सरावगी ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस की ओर से इस पूरे मुद्दे को लेकर अलग राजनीतिक दृष्टिकोण रखा गया है।
सरावगी ने महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधीजी भी वंदे मातरम् से जुड़े शुद्ध राष्ट्रीय भाव को समझते थे। उन्होंने कहा कि इस गीत को किसी धर्म या समुदाय के साथ जोड़ना स्वतंत्रता आंदोलन की भावना के विपरीत है। उनके अनुसार वंदे मातरम् को भारत की साझा राष्ट्रीय विरासत के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी एक समूह की पहचान के रूप में।
गांव-गांव तक वंदे मातरम् की विरासत ले जाने की तैयारी
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि पार्टी वंदे मातरम् के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका को गांवों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों तक ले जाएगी। खास तौर पर युवा पीढ़ी को इस गीत से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान के बारे में बताया जाएगा। उनका कहना है कि नई पीढ़ी को यह समझना जरूरी है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने में ऐसे प्रतीकों की क्या भूमिका रही थी।
उन्होंने कहा कि भाजपा वंदे मातरम् का सम्मान किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि देश की एकता और स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी मानती है। सरावगी ने पार्टी की ओर से इसके सम्मान से किसी भी तरह का समझौता नहीं करने की बात कही। साथ ही उन्होंने कांग्रेस से अपील की कि राष्ट्रीय एकता से जुड़े मुद्दों पर टकराव और विभाजन की राजनीति के बजाय रचनात्मक भूमिका निभाई जाए।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच मुद्दा गरमाया
वंदे मातरम् को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बहस ऐसे समय में तेज हुई है, जब राष्ट्रीय गीत के इतिहास, उसके गायन और सार्वजनिक आयोजनों में उसकी भूमिका को लेकर दोनों दलों के नेताओं के अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। संजय सरावगी का ताजा बयान इसी राजनीतिक बहस को बिहार में भी सामने लाता है। फिलहाल भाजपा ने इसे राष्ट्रीय सम्मान और स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत से जोड़ा है, जबकि कांग्रेस के रुख पर भाजपा लगातार सवाल उठा रही है।
नोट: कांग्रेस और अन्य राजनीतिक पक्षों पर लगाए गए आरोपों को संबंधित नेता के बयान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उन्हें स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं लिखा गया है।
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